'कर्ज चुकाने के लिए बुरी फिल्में भी कीं...', Manoj Bajpayee ने पहला घर खरीदने के लिए किए थे कई जतन - manoj bajpayee did bad films to pay off his first home loan
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मनोज बाजपेयी (Manoj Bajpayee) ने खुलासा किया है कि कर्ज चुकाने के लिए उन्हें वो फिल्में भी करनी पड़ीं, जिसके लिए उनका दिल राजी नहीं था।

मनोज बाजपेयी को करनी पड़ी थीं बुरी फिल्में। फोटो क्रेडिट- सोशल मीडिया

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जागरण न्यूज नेटवर्क, मुंबई। घर महज चारदीवारी नहीं होता, उसमें अपनों के साथ बिताए लम्हों और अनगिनत यादों की एक पूरी दुनिया बसती है। इसी भाव को केंद्र में रखती है फिल्म द लास्ट मैन इन टावर (The Last Main In The Tower) जो अरविंद अडिगा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है।
फिल्म में सेवानिवृत्त शिक्षक मास्टरजी अपने घर को रीडेवलपमेंट के लिए देने को तैयार नहीं हैं। मास्टरजी के किरदार में मनोज बाजपेयी (Manoj Bajpayee) नजर आएंगे, जबकि उनकी पड़ोसी की भूमिका दिव्या दत्ता (Divya Dutta) ने निभाई है। दोनों ने अपनी फिल्म, शिक्षक दिवस (Teacher's Day) के मौके पर पर खास बातचीत की।
पहला मकान खरीदने की क्या यादें हैं?
मनोज : कोई भी आदमी जब घर खरीदता है तो अपने बैंक अकाउंट में जितने भी पैसे होते हैं उससे ज्यादा ही औकात में खरीदता है। हमने भी घर खरीदा हम भी कर्जे में डूबे हम भी कैसे-कैसे करके उससे बाहर निकले कुछ बहुत बुरी फिल्में की कर्जे चुकाने के लिए, लेकिन उसका अफसोस इसलिए नहीं है कि फिल्में चाहे जितने भी बुरी हों जानते हुए की थी कि इससे जो मुद्रा आएगी उससे घर आ रहा है। (हंसते हैं)
दिव्या : अपना घर होने की अहमियत खास होती हैं। इंडस्ट्री में आने पर हम सब की कहानी एकसमान होती है। हम सबकी जिद्दोजहद होती है अपना कमाओ। मैंने तो उधार लिया था अपनी मां से (ठहाका मारती हैं), फिर वापस भी किया। पर वो अहसास बहुत खूबसूरत होता है। वो पहला साइन चेक हो, पहला घर हो, पहली गाड़ी उन चीजों की यादें हमेशा जेहन में रहती हैं।
मास्टर जी का किरदार निभाने के लिए अपनी किसी शिक्षक की तरह भूमिका निभाई?
मनोज : ऐसा कुछ भी नहीं था, लेकिन जीवन की यात्रा ऐसी रही है कि इसमें हर तरह के लोग आपसे मिलते रहे हैं। हजारों रेफरेंसेज हैं, हजारों ऐसे अनुभव हैं लोगों के साथ में या उनको दूर से देखा या नजदीक से या उनको जाना है बहुत करीब से वो ऐसे बहुत सारे लोग मिलकर के फिर एक किरदार बनते हैं। जानबूझ कर मैं किसी को लाने की कोशिश नहीं करता हूं।

अगर कोई कैरेक्टर मुझे दिखना शुरू हो जाता है तो उसमें फिर कुछ एक चीजें आप डालते हो, लेकिन सारी तैयारी करने के बाद मैं शूटिंग से छह-सात दिन पहले वो छोड़ देता हूं। उसके बाद सीधा फिर सेट पर जाता हूं ताकि कुछ नया किया जा सके। नया तो तभी कर सकता हूं अगर मेरा फाउंडेशन सही हो।
स्कूल में कैसे स्टूडेंट्स थे आप दोनों?
दिव्या : मैं तो फ्रंट बेंचर (सबसे आगे बैठने वालों में) थी और सब गॉसिप पीछे रह जाता था। मुझे टीचर के सामने सब निर्देश मिलते थे हेडगर्ल थी, लेकिन सबसे शरारती थी और यह भी एक विडंबना ही थी कि कक्षा की सबसे शरारती बच्ची ही हेड गर्ल बनी थी और सबसे ज्यादा बातें करने वाली भी मैं ही थी।
क्लास को तो मैं क्या ही चुप कराऊंगी, लेकिन मुझे गतिविधियों में हिस्सा लेना पसंद था। मुझे लोगों को समूहों में लेकर उनके साथ टीमवर्क में काम करना अच्छा लगता था। इसलिए मेरे लिए शायद यही सबसे खास बात थी।
मनोज : मैं बैकबेंचर था। मैं बीच में बैठता था सबसे पीछे बदमाश बैठते थे। (दिव्या ठहाका मारती हैं) मैं न पूरी तरह बदमाश था ना पूरे तरीके से अच्छा था। मैं हमेशा एवरेज स्टूडेंट रहा हूं। परीक्षा के बीस दिन पहले पढ़ना शुरू करता था। उसके पहले कोई मेहनत नहीं उसके पहले सिर्फ वाद विवाद प्रतियोगिताएं, हॉकी या क्रिकेट यही सब चलता रहता था। मुझे मस्ती करने में बड़ा मजा आता था।
अपने उम्र के बच्चों के साथ में घूमना फिरना टहलना, अच्छा लगता था। मुझे बड़ा अच्छा लगता है मेरी बेटी भी ऐसी है लेकिन इस साल दसवीं क्लास में है तो मैं देख रहा हूं बहुत सीरियस हो गई है कि उसको बोर्ड में अच्छे नंबर लाने है इतना सीरियस मैं नहीं था।
किस टीचर की डांट अभी तक याद है?
मनोज : मेरे संस्कृत टीचर थे, उनको हम गुरुदेव बोलते थे। मैं संस्कृत में बहुत अच्छा था बहुत अच्छे नंबर लाते थे। वो बहुत डांटते थे मुझे। फिर एक गंगा सागर टीचर थे वो बायोलॉजी पढ़ाते थे वो बहुत डांटते थे, दुबले पतले, छोटे कद के थे तो कूद कर बेंत से मारते थे (मनोज उनकी एक्टिंग करके दिखाते हैं ठहाका मारते हैं)।
दिव्या : मुझे डांट नहीं पड़ी पर हां एक बार हिंदी कविता की प्रतियोगिता थी और मुझे सेलेक्ट किया गया। मैं अभिनय, डांस बहुत अच्छा करती थी लेकिन ये एक चीज थी जो मैंने कभी नहीं की तो मैंने कहा ठीक है करते हैं लंबी सी कविता थी चार पांच पेज की तो मुझे टेबिल पर खड़ा किया कि पढ़ कर सुनाओ और पूरी तैयारी करवाई उस टीचर ने मेरी और स्टेज पर गए तो सब भूल गई मतलब उस वक्त दिमाग ही खाली हो गया।

मैं वापस आईं उन टीचर ने मुझे कुछ नहीं कहा। उस चुप्पी ने मुझे परेशान कर दिया। उसके बाद मैंने कहा ये आज हुआ है ये अब नहीं होगा। अगर कर नहीं सकती हो तो मना कर दो। अगली बार जब कविता प्रतियोगिता होने वाली थी तो मैं छुप गई पीछे कि मैं कहीं इसमें सेलेक्ट हो जाऊं तो दूसरा टीचर ने मुझे ढूंढा। उन्होंने कहा कि बाहर आओ तुम पांच प्रतिभागियों में एक होगी।
यह सीन मैंने किसी फिल्म में देखा है कि वो नजरें नहीं मिलाते दर्शकों से इस तरह से पढ़ा। (हंसती हैं) और मैंने ऐसा पढ़ा कि कहीं ध्यान भंग न हो जाए। आखिर की लाइनें रह गई मुझे लगा कि भूलने की कोई गुंजाइश नहीं है तो मैंने नजरें उठाकर कविता पढ़ी। फिर मैंने अपनी उन टीचर की ओर देखा तो वो मुस्कुरा दी। कई बार साइलेंस डांट से ज्यादा काम कर जाती है।
किस टीचर ने आपकी प्रतिभा को सबसे पहले पहचाना था ?
मनोज: ब्रदर टॉम थे मेरे। कैथलिक स्कूल था मेरा। काफी युवा थे। वो मुझे कहते थे कि तुम्हें एक्टिंग करनी चाहिए। तब मेरी उम्र करीब 14 साल रही होगी। वह बहुत प्रोत्साहित करते थे। पहली बार नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का नाम उनसे ही सुना था। उसका किस्सा कुछ अलग ही रहा कि तीन बार रिजेक्ट हुआ। पर ब्रदर टॉम से काफी प्रोत्साहन और प्रेरणा मिली वो स्कूल कार्यक्रम में ड्रामा, स्किट, म्यूजिक सब वही मानिटर करते थे।
दिव्या : कालेज में एक लड़की बहुत अच्छा परफार्म करती थी। मैं नई गई थी। मुझे कोई आगे आने ही नहीं देता था कि पीछे रहो इसका बोलबाला है यहां पर। मेरी एक टीचर जो डमैटिक प्रोग्राम कराती थी उन्होंने कहा कि यह करेगी इस साल का न्यू कमर्स का कार्यक्रम। उन पर दबाव आया कि यह नहीं कर सकती वही करेगी।
फिर मेरी हेडगर्ल, सीनियर और उन टीचर ने कहा कि यह परफॉर्मेंस यही लड़की करेगी। यह मैं भूल नहीं सकती। मेरा गर्ल्स कॉलेज था। मैं डांस कर रही थी सारी लड़कियां मुझे चीयरअप कर रही थी। उसके बाद कॉलेज के स्टेज ने मुझे अपना लिया।
किस कलाकार के साथ काम करके लगा कि एक्टिंग मास्टरक्लास हो गई ?
मनोज : मेरे समकालीन कलाकार बहुत शानदार हैं। मैंने के के मेनन, साथ काम किया है। मेरे बाद की पीढ़ी के कलाकारों में जयदीप अहलावत हो, विजय राज का निजी तौर पर मैं बहुत बड़ा प्रशंसक हूं। वो ग्रेट एक्टर हैं। अब तक उनकी क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी अपनी कला को लेकर जुनूनी हैं। मैं उनका भी प्रशंसक हूं।
गली गुलिया फिल्म में नीरज काबी को देखना बहुत ही कमाल था। मैंने अपने समकालीन से बहुत सीखा है। जब एकदूसरे से मिलते थे तो एकदूसरे के काम की बातें किया करते थे, लेकिन अभी जो भी छोटे शहरों से कलाकार आते हैं एक्टिंग करना चाहते हैं। उनका काम देखकर मैं दंग रह जाता हूं।
जैसे इस फिल्म में मेरे बेटे की भूमिका में सुकांत गोयल बहुत शानदार कलाकार हैं। बमन ईरानी के क्या ही कहना। अगर आप अपना आंख कान खोलकर रखो तो अगल बगल बहुत कुछ है सीखने को, हॉलीवुड जाने की जरूरत नहीं सीखने के लिए। आपके अगल बगल के टैंलेंट सिखाते रहते हैं।
दिव्या : मैं किस्मत वाली हूं कि मनोज, इरफान और बहुत से कलाकार जिनके साथ मैंने काम किया। अमिताभ बच्चन साहब को अगर रिहर्सल करते देख लें तो पांच मुख्तलिफ तरह के रिहर्सल करेंगे। ऐसे करें कि वैसे करें। मनोज ने सही कहा कि हर किसी से आप सीखते हो। शबाना आजमी जी के साथ काम कर रही थी उसमें मैं खलनायिका थी और वो लीड में थी।
मुझसे बोला नहीं जा रहा। फिर वो मेरे पास आई। उन्हें पता था कि यह पहला टेक अच्छा करती हैं तो उन्होंने प्यार से मेरे चेहरे को छुआ। उन्होंने कहा कि घबराओ नहीं। इतने अच्छे सहकलाकार मिले जो जानते हैं कि आपकी स्ट्रेंथ और कमजोरी क्या है उनको आपके लिए इस्तेमाल करते हैं। यह शानदार हैं। मेरा मानना है कि कोई न कोई आपको मिलता है जिससे आप कुछ सीखकर जाते हैं।
बात वही है कि स्टूडेंट बने रहना जिंदगी भर। अगर आप कहें कि आपको सब आता है वो संभव ही नहीं है। हम बिल्कुल कोने किनारे खड़े हैं। आगे बहुत बड़ा दरिया है, जहां टैलेंट ही टैलेंट भरा है।
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