Middle East geopolitics: क्या बदल जाएगा मिडिल ईस्ट का समीकरण? सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के रक्षा समझौते में ईरान को मिला न्योता! - Haribhoomi

सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते में ईरान को शामिल होने का न्योता मिलने का दावा किया गया है। जानिए क्या है पूरी खबर।

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सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते में ईरान को शामिल होने का न्योता मिलने का दावा किया गया है।

  • Published: 24 Aug 2026, 02:46 PM IST
  • Last Updated: 24 Aug 2026, 02:46 PM IST

Mecca Joint Defence Agreement: पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में एक चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हाल ही में हुए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते में ईरान को भी शामिल होने का प्रस्ताव मिला है। एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने दावा किया है कि तेहरान इस विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहा है।

लेबनान के बेरुत स्थित न्यूज चैनल 'अल मयादीन' से बातचीत के दौरान यह दावा ईरानी संसद की 'खाना-ए-मिल्लत' न्यूज एजेंसी के प्रमुख महदी रहीमी ने किया। उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव की समीक्षा की जा रही है, क्योंकि क्षेत्र के देश अब एक 'क्षेत्रीय सुरक्षा छतरी' की तलाश की ओर बढ़ रहे हैं।

रहीमी ने इस घटनाक्रम को ईरान के लिए एक बड़ी जीत बताया, क्योंकि देश लंबे समय से ऐसी व्यवस्था की मांग कर रहा था। हालांकि, ईरानी विदेश मंत्रालय या किसी अन्य आधिकारिक स्तर पर इस खबर की पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन अगर यह सच साबित होता है, तो यह मध्य पूर्व के पूरे समीकरण को बदल सकता है।

क्या है 'मक्का ज्वॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट'?
सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने पिछले महीने 7 अगस्त को इस त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसे 'मक्का ज्वॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट' के नाम से भी जाना जाता है। इस समझौते का प्रारूप अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो (NATO) संगठन की तर्ज पर तैयार किया गया है, जिसके तहत किसी भी एक सदस्य देश पर हुआ हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा।

एक साझा बयान में स्पष्ट किया गया था कि इस समझौते का उद्देश्य किसी भी आक्रामकता के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध को मजबूत करना है। साथ ही, यह तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के सभी पहलुओं को और अधिक बढ़ावा देने का प्रावधान भी करता है।

शुरुआत में यह समझौता भले ही इन तीनों देशों तक सीमित हो, लेकिन तुर्की यह संकेत दे चुका है कि भविष्य में अन्य देश भी इसमें शामिल हो सकते हैं। इससे पहले तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने मिस्र द्वारा इस समझौते में रुचि दिखाने का दावा किया था। इसके अलावा, बांग्लादेश के दो जूनियर मंत्रियों- हुमायूं कबीर और शमा ओबैद इस्लाम ने भी यह बयान दिया था कि ढाका इस रक्षा समझौते में शामिल होने पर विचार कर सकता है।

सऊदी-ईरान प्रतिद्वंद्विता और बदलता परिदृश्य
जब इस समझौते की शुरुआत हुई थी, तब विश्लेषकों का मानना था कि इसका मुख्य उद्देश्य सऊदी अरब के लिए मध्य पूर्व में ईरानी प्रभाव को संतुलित करना और किंगडम को सुरक्षा की गारंटी देना है। यमन के हूती विद्रोहियों और इराक समर्थित मिलिशिया द्वारा लगातार हो रहे हमलों के कारण सऊदी अरब के लिए यह समझौता बेहद अहम माना जा रहा था।

शुरुआत में ईरान ने इस समझौते पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति आयोग के सदस्य इब्राहिम रजाई ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर चेतावनी दी थी कि तुर्की और पाकिस्तान के साथ कागजी समझौता सऊदी अरब को दीर्घकालिक सुरक्षा नहीं दे सकता है।

लेकिन अब महदी रहीमी के दावों ने इस पूरी तस्वीर को नया मोड़ दे दिया है। ईरान और सऊदी अरब पारंपरिक रूप से क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी रहे हैं और प्रॉक्सी युद्धों के जरिए एक-दूसरे से मुकाबला करते आए हैं। यदि ईरान को इस त्रिपक्षीय समझौते में शामिल होने का औपचारिक न्योता मिला है, तो यह दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और मुस्लिम जगत में एकता की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिक्रिया
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए इस समझौते का पहले ही स्वागत किया था। उन्होंने कहा था कि इस समझौते से इन तीनों देशों को सार्थक तरीके से अपनी रक्षा करने में मदद मिलेगी।

ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर इसे एक बड़ा और साहसिक कदम करार देते हुए कहा था कि इससे यह साबित होता है कि मध्य पूर्व के देश अब एकजुट हो रहे हैं।

ट्रंप के यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव पिछले पांच महीनों से जारी है। एक तरफ जहां ईरान साल 2028 में ट्रंप का कार्यकाल समाप्त होने तक लंबी लड़ाई लड़ने की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ ट्रंप प्रशासन ने होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की शर्त पर शांति समझौता करने की इच्छा भी जताई है, जिसके बंद होने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह प्रभावित हुई है।