Mirzapur The Movie Review: मुन्ना भैया के स्वैग से रवि किशन की एंट्री तक, कायम है 'मिर्जापुर' का भौकाल

Time Published: Friday, September 4, 2026, 17:53 [IST]

फिल्म: मिर्जापुर द मूवी (Mirzapur The Movie)
स्टारकास्ट: पंकज त्रिपाठी, अली फजल, जितेंद्र कुमार, दिव्येंदु शर्मा, रवि किशन
डायरेक्टर: गुरमीत सिंह
रन टाइम: 3 घंटे 17 मिनट
रेटिंग: 4 (****)

Mirzapur The Movie Review: तीन सीजन तक ओटीटी पर अपना दबदबा कायम रखने वाली 'मिर्जापुर' अब सिनेमाघरों में पहुंच चुकी है। लंबे इंतजार के बाद जब इस पॉपुलर यूनिवर्स ने बड़े पर्दे पर कदम रखा, तो सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या फिल्म दर्शकों को वही पुराना रोमांच और भौकाल दे पाएगी? इसका जवाब काफी हद तक हां है। पुराने चहेते किरदारों की वापसी, कुछ नए चेहरों की एंट्री, दमदार सेकंड हाफ, मजेदार डायलॉग्स और क्लाइमेक्स में आने वाला ट्विस्ट फिल्म को एक मसाला एंटरटेनर बना देता है।

Mirzapur The Movie

जो दर्शक 'मिर्जापुर' की दुनिया से पहले से जुड़े हुए हैं, उनके लिए फिल्म में नॉस्टैल्जिया की भरपूर डोज है। वहीं पहली बार इस यूनिवर्स को बड़े पर्दे पर देखने वाले दर्शकों के लिए भी इसमें क्राइम, बदला, सत्ता की लड़ाई और भरपूर मनोरंजन मौजूद है।

कहानी में फिर छिड़ी 'मिर्जापुर' की गद्दी की जंग

-फिल्म की कहानी उसी दुनिया को आगे बढ़ाती है, जहां मिर्जापुर की सत्ता को लेकर संघर्ष कभी खत्म नहीं हुआ। कालीन भैया यानी पंकज त्रिपाठी, गुड्डू पंडित यानी अली फजल, बबलू पंडित के किरदार में जितेंद्र कुमार और मुन्ना भैया यानी दिव्येंदु शर्मा से जुड़े पुराने समीकरण कहानी को आगे बढ़ाते हैं।

-इसी बीच जैसलमेर से बब्बन यादव यानी रवि किशन की एंट्री होती है। वो सिर्फ 'मिर्जापुर' की दुनिया में नया खिलाड़ी बनकर नहीं आता बल्कि उसकी नजर सीधे सत्ता और गद्दी पर है। उसके आने से पहले से चल रही सत्ता की लड़ाई और पेचीदा हो जाती है।

-दूसरी तरफ बीना त्रिपाठी के रूप में रसिका दुग्गल और शरद शुक्ला के किरदार में अंजुम शर्मा भी अपने-अपने हिसाब से चालें चलते नजर आते हैं। कहानी धीरे-धीरे इस सवाल की तरफ बढ़ती है कि आखिर मिर्जापुर की गद्दी पर किसका राज कायम होगा।

पहला हाफ थोड़ा धीमा लेकिन सेकंड हाफ में बढ़ता है मजा

-'मिर्जापुर: द मूवी' को लेकर सबसे बड़ा कन्फ्यूजन यही था कि तीन सीजन के बाद फिल्म की कहानी में नया क्या होगा। फिल्म का पहला हिस्सा इस सवाल का तुरंत जवाब नहीं देता। शुरुआत में कहानी किरदारों और नए ट्रैक को स्थापित करने में ज्यादा वक्त लेती है। इस वजह से फर्स्ट हाफ कुछ जगहों पर अपेक्षाकृत धीमा महसूस हो सकता है।

-हालांकि इंटरवल के बाद फिल्म की रफ्तार बदल जाती है। सेकंड हाफ में कहानी में नए मोड़ आते हैं और कई ऐसे सीक्वेंस देखने को मिलते हैं, जो फिल्म को पकड़ देते हैं। खास तौर पर डार्क कॉमेडी, चुटीले संवाद और किरदारों के बीच की नोकझोंक मिर्जापुर की पुरानी पहचान को बरकरार रखती है।

-कालीन भैया, जेपी यादव और मुन्ना भैया से जुड़ा लंबा सीक्वेंस फिल्म के मजेदार हिस्सों में शामिल है। वहीं सेकंड हाफ का कार चेज सीक्वेंस भी तनाव और कॉमेडी के अच्छे मिश्रण की वजह से ध्यान खींचता है।

एक्शन अच्छा लेकिन और भव्य हो सकता था

'मिर्जापुर' जैसे यूनिवर्स से जब फिल्म बड़े पर्दे पर आती है तो दर्शकों की उम्मीद एक्शन को लेकर भी काफी बढ़ जाती है। फिल्म में एक्शन की कमी नहीं है और कुछ सीक्वेंस मनोरंजन करते हैं लेकिन मिर्जापुर के मिजाज को देखते हुए इसे और बड़े स्तर पर पेश किया जा सकता था। फिल्म का एक्शन खराब नहीं है लेकिन अगर इसे थोड़ा और भव्य बनाया जाता तो थिएटर एक्सपीरियंस और ज्यादा शानदार हो सकता था।

डायलॉग्स और डार्क कॉमेडी ने संभाली कमान

-'मिर्जापुर' की असली पहचान सिर्फ इसकी कहानी या हिंसा नहीं बल्कि इसके किरदारों के अंदाज और डायलॉग्स भी हैं। फिल्म इस मामले में अपनी जड़ों से बहुत ज्यादा दूर नहीं जाती। डार्क ह्यूमर और किरदारों के बीच होने वाली मजेदार बातचीत कई जगह फिल्म की गंभीर कहानी के बीच राहत देती है। खासकर मुन्ना भैया से जुड़े सीन्स में वही पुराना स्वैग देखने को मिलता है, जिसकी वजह से यह किरदार दर्शकों के बीच इतना लोकप्रिय हुआ था।

-बंदे दो नंबरी को छोड़ दें तो फिल्म का म्यूजिक ऐसा नहीं है जो लंबे समय तक याद रह जाए। हालांकि बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म के माहौल और किरदारों के तेवर के साथ तालमेल बैठाता है।

मेकर्स ने नहीं बदला 'मिर्जापुर' का मूल अंदाज

फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि मेकर्स ने सिर्फ बड़े पर्दे पर लाने के लिए 'मिर्जापुर' के मूल मिजाज के साथ बहुत ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की है। कहानी में नए किरदार और नए ट्रैक जरूर जोड़े गए हैं लेकिन उन्हें भी उसी दुनिया और उसी टोन में रखा गया है। सत्ता, बदला, विश्वासघात और गद्दी के लिए होने वाली लड़ाई एक बार फिर कहानी के केंद्र में है। यही वजह है कि फिल्म देखने के दौरान पुराने फैंस को एक जाना-पहचाना एहसास मिलता रहता है।

पंकज त्रिपाठी से दिव्येंदु तक, एक्टिंग में किसने मारी बाजी?

-एक्टिंग की बात करें तो फिल्म की स्टारकास्ट इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। अली फजल एक बार फिर गुड्डू पंडित के किरदार में अपनी दमदार बॉडी और आक्रामक अंदाज से प्रभावित करते हैं। उनके किरदार में पहले के मुकाबले एक अलग तरह की तीव्रता नजर आती है।

-वहीं पंकज त्रिपाठी ने कालीन भैया के किरदार की ठंडक और खौफ को बरकरार रखा है। उनका शांत अंदाज ही कई बार उनके किरदार को सबसे ज्यादा खतरनाक बनाता है। जितेंद्र कुमार भी बबलू त्रिपाठी के किरदार में अच्छे लगते हैं। हालांकि कुछ जगहों पर उनका लुक और अंदाज आपको विक्रांत मैसी की याद दिला सकता है।

-फिल्म में अगर किसी एक किरदार को लेकर दर्शकों में सबसे ज्यादा उत्साह था, तो वो मुन्ना भैया थे। दिव्येंदु शर्मा ने एक बार फिर इस किरदार का वही एंटी-हीरो वाला स्वैग पर्दे पर उतार दिया है। उनके डायलॉग्स, एक्सप्रेशन और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म के सबसे यादगार हिस्सों में शामिल हैं।

-'जैसलमेर हमको नहीं देखा है' जैसे डायलॉग हों या जेपी यादव के साथ उनके सीक्वेंस, दिव्येंदु हर बार दर्शकों को एंटरटेन करते हैं। केक वाला सीन भी मजेदार है और मुन्ना भैया की मौजूदगी फिल्म में उस पुराने मिर्जापुर फ्लेवर को वापस ले आती है, जिसे फैंस काफी मिस कर रहे थे।

-रवि किशन की बब्बन यादव के तौर पर एंट्री फिल्म में एक नया रंग जोड़ती है। उनके किरदार में देसी अंदाज और एक अलग तरह की एनर्जी है, जो कहानी को एक नए ट्रैक पर ले जाती है। रवि किशन अपने अनुभव और स्क्रीन प्रेजेंस से किरदार को मजबूती देते हैं। उनकी एंट्री के बाद कहानी में आने वाला बदलाव फिल्म के दूसरे हिस्से को ज्यादा दिलचस्प बनाने में मदद करता है।

-महिला किरदारों की बात करें तो बीना त्रिपाठी के रूप में रसिका दुग्गल एक बार फिर मजबूत नजर आती हैं। उन्होंने अपने किरदार की चालाकी, मजबूती और परिस्थितियों के हिसाब से फैसले लेने वाली फितरत को अच्छी तरह पकड़ा है।

-शीबा चड्ढा अपने हिस्से के मनोरंजक पलों में प्रभाव छोड़ती हैं जबकि सोनल फिल्म में ग्लैमर का तड़का लगाती हैं। हालांकि कुछ पुराने महिला किरदारों जैसे गोलू, डिंपी और स्वीटी को कहानी में उतनी जगह नहीं मिलती, जितनी दर्शक उम्मीद कर सकते हैं। मोहित मलिक भी अपने किरदार में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में कामयाब रहते हैं।

क्यों देखें 'मिर्जापुर: द मूवी'?

अगर आप 'मिर्जापुर' के पुराने फैन हैं तो मुन्ना भैया का स्वैग, कालीन भैया का खौफ और गुड्डू पंडित का आक्रामक अंदाज आपको थिएटर तक खींचने के लिए काफी है। इसके अलावा रवि किशन की नई एंट्री, जितेंद्र कुमार का किरदार, दमदार डायलॉग्स, डार्क कॉमेडी और सेकंड हाफ के ट्विस्ट फिल्म को देखने की वजह देते हैं। फर्स्ट हाफ की रफ्तार और एक्शन को लेकर थोड़ी शिकायत हो सकती है लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म जिस तरह रफ्तार पकड़ती है, वो इसकी कमियों को काफी हद तक संभाल लेती है।

फाइनल वर्डिक्ट

'मिर्जापुर: द मूवी' अपने पुराने फैंस को ध्यान में रखकर बनाई गई एक मसाला फिल्म है। ये फ्रेंचाइजी के मूल अंदाज को बदलने के बजाय उसी भौकाल, क्राइम, सत्ता, बदले और डायलॉगबाजी को बड़े पर्दे पर लेकर आती है। फिल्म का पहला हिस्सा थोड़ा धीमा जरूर है लेकिन सेकंड हाफ, मुन्ना भैया का स्वैग, रवि किशन की एंट्री, दमदार एक्टिंग और क्लाइमेक्स का ट्विस्ट इसे एक एंटरटेनिंग थिएटर वॉच बनाते हैं।