MLC चुनाव में निशांत कुमार की अग्निपरीक्षा! JDU हारी तो बढ़ेगी उत्तराधिकार की लड़ाई, समझिए JDU का मास्टर प्लान
Published: Friday, September 18, 2026, 10:09 [IST]
बिहार में अक्टूबर-नवंबर में विधान परिषद (MLC) की 8 सीटों पर चुनाव होने वाले हैं। नीतीश कुमार के सीएम पद से हटने और भोजपुर-बक्सर सीट गंवाने के बाद जनता दल यूनाइटेड (JDU)
के लिए यह चुनाव करो या मरो जैसा हो चुका है। यही वजह है कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार अब खुद मोर्चे पर उतर आए हैं। वह ताबड़तोड़ बैठकें कर रहे हैं। अगर इस चुनाव में बाजी उल्टी पड़ी, तो JDU और निशांत दोनों के लिए आगे की राहें बहुत मुश्किल हो जाएंगी।
सवाल यह है कि यह चुनाव निशांत कुमार के लिए इतना जरूरी क्यों है। अगर JDU का प्रदर्शन खराब रहा, तो पार्टी के सामने कौन-कौन से संकट खड़े हो सकते हैं। आइए पूरे मामले को समझते हैं।
8 सीटों का गणित और JDU का दांव
16 नवंबर 2026 को विधान परिषद की 8 सीटों का कार्यकाल पूरा हो रहा है। इनमें 4 स्नातक और 4 शिक्षक कोटे की सीटें हैं। JDU इनमें से 4 सीटों पर ताल ठोकने की तैयारी में है। पटना स्नातक से नीरज कुमार का उतरना तय माना जा रहा है। मुजफ्फरपुर दौरे में निशांत ने तिरहुत स्नातक से अभिषेक झा के नाम का संकेत दिया था।
वहीं सारण शिक्षक सीट से मंत्री अशोक चौधरी ने पुष्कर आनंद के नाम की घोषणा की थी। दरभंगा शिक्षक सीट से दिलीप चौधरी रेस में सबसे आगे चल रहे हैं। 8 मार्च 2026 को JDU में शामिल हुए निशांत कुमार 7 मई को सम्राट कैबिनेट में स्वास्थ्य मंत्री बने थे। अब उनके सामने खुद को साबित करने की बड़ी चुनौती है।
निशांत कुमार के लिए यह चुनाव क्यों है करो या मरो?
इस चुनाव के नतीजे निशांत का भविष्य तय करेंगे। इसके पीछे ये हैं कुछ वजह।
पटना सीट पर परसेप्शन का खेल: पटना स्नातक सीट JDU के लिए साख का सवाल है। इसमें पटना, नवादा और नीतीश कुमार का गृह जिला नालंदा आता है। यहां 87 हजार से ज्यादा वोटर हैं और 2025 में एनडीए ने यहां की 26 में से 22 विधानसभा सीटें जीती थीं। यहां बाहुबली विधायक अनंत सिंह खुलकर नीरज कुमार का विरोध कर रहे हैं। 7 सितंबर की बैठक नाकाम रहने के बाद 16 सितंबर को निशांत ने खुद कमान संभाली। अगर यह सीट हारी, तो संदेश जाएगा कि नीतीश का किला ढह गया।

उत्तराधिकार पर उठेंगे सवाल: उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेता लगातार नीतीश की विरासत पर दावा ठोकते हैं। सीएम बने सम्राट चौधरी भी स्वाभाविक दावेदार दिखते हैं। हालांकि JDU निशांत को ही असली वारिस मानती है। निशांत के एक्टिव होने के बाद यह पहला बड़ा चुनाव है। वोटर पढ़े-लिखे हैं। अगर पार्टी हारी, तो निशांत के नेतृत्व पर तुरंत सवाल खड़े हो जाएंगे।
काडर का टूटेगा भरोसा: किसी भी क्षेत्रीय पार्टी की ताकत उसके कार्यकर्ता होते हैं। हार से कार्यकर्ताओं में यह मैसेज जाएगा कि नया नेतृत्व अपने खास उम्मीदवार को भी नहीं जिता पा रहा है। इससे वर्करों का मनोबल टूटेगा और संगठन बिखर सकता है।"
पुराने नेताओं का बढ़ेगा दबदबा: JDU के भीतर अंदरूनी खींचतान किसी से छिपी नहीं है। अगर चुनाव जीते तो निशांत का कब्जा पक्का हो जाएगा। लेकिन अगर नतीजे खिलाफ आए, तो साइडलाइन किए गए पुराने दिग्गज नेता फिर से हावी हो जाएंगे।

JDU की जीत की रणनीति क्या है?
JDU चार स्तरों पर तैयारी कर रही है। पहली रणनीति के तहत सांसदों, विधायकों और जिला स्तर के नेताओं को अपने-अपने इलाकों की जिम्मेदारी दी जा रही है। नेताओं से कहा जा रहा है कि वे पूरे क्षेत्र में घूमने के बजाय अपने इलाके के मतदाताओं से सीधा संपर्क करें।
दूसरी कोशिश नाराज नेताओं को साथ लाने की है। पटना सीट पर अनंत सिंह से बातचीत की गई है। बैठक में सहमति नहीं बनी, लेकिन पार्टी को आगे समाधान की उम्मीद है। तिरहुत स्नातक और सारण शिक्षक सीटों पर भी वरिष्ठ नेता स्थानीय नेताओं के संपर्क में हैं।
तीसरी रणनीति कार्यकर्ताओं को यह भरोसा दिलाने की है कि नीतीश कुमार के बाद भी JDU अपनी अलग पहचान के साथ आगे बढ़ेगी। इसी संदेश के लिए 12 जिलों में 'नीतीश संवाद' कार्यक्रम किया गया। राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने कहा कि पार्टी सत्ता रहे या न रहे, बिहार के मुद्दों पर लड़ाई जारी रखेगी।
इसके अलावा JDU ने बिहार विधान परिषद के सभापति पद पर भी दावा जताया है। अभी यह पद BJP के पास है और अवधेश नारायण सिंह सभापति हैं। JDU का तर्क है कि विधानसभा अध्यक्ष और विधान परिषद सभापति, दोनों पद BJP के पास नहीं होने चाहिए। इस मांग के जरिए पार्टी अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को बराबरी की साझेदारी का संदेश देना चाहती है।