MP: 4338 बच्चे अति कुपोषित, 44 अब भी अस्पताल में भर्ती; बालाघाट में बैगा मासूमों पर क्यों मंडरा रहा संकट?

बालाघाट जिले में कुपोषण की समस्या गंभीर बनी हुई है। कुपोषण के कारण बच्चे कमजोर हो जाते हैं और पौष्टिक आहार नहीं मिलने के कारण बीमारियों की चपेट में आकर उनकी मृत्यु भी हो जाती है। जुलाई 2026 तक के आंकड़ों की बात की जाए तो महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारी देवेंद्र सुंदरियाल से मिले आंकड़ों के मुताबिक जुलाई महीने तक जिले में 4,338 बच्चे अति कुपोषित हैं। हालांकि, इनके पोषण और स्वास्थ्य सुधार के लिए लगातार अभियान चलाया जा रहा है।





बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत की संख्या भले ही प्रशासन आठ बता रहा है, लेकिन जमीनी स्थिति कुछ और ही तस्वीर सामने आने की बात कही जा रही है। करीब 21 से अधिक बच्चों की मौत होने का दावा किया जा रहा है। इन घटनाओं के पीछे शासन-प्रशासन की लापरवाही के साथ ही मूलभूत सुविधाओं का अभाव भी प्रमुख कारण बताया जा रहा है।

विज्ञापन



नए साल की दस्तक से पहले ही बीमार पड़ने लगे थे बच्चे


बालाघाट के बैहर एवं बिरसा विकासखंड में दूषित पानी और कुपोषण के कारण बच्चों की हालत पहले से ही ठीक नहीं थी। धीरे-धीरे कुपोषण और गंदगी का असर दिखाई देने लगा और एक-एक करके बच्चों की मौत के मामले सामने आने लगे। इसके बाद जुलाई महीने में अलग-अलग कारणों से कई बच्चों की मौत हुई। तब प्रशासन स्वास्थ्य और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर हरकत में आया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।

विज्ञापन



साफ पीने के पानी के लिए भटकते हैं ग्रामीण


बालाघाट के कई क्षेत्रों में पहाड़ी और ग्रामीण इलाका होने के कारण ग्रामीणों तक पानी की पर्याप्त सुविधा नहीं पहुंच पाई है। जहां सरकार ने नल-जल योजना के तहत पानी की सुविधा उपलब्ध कराई भी है, वहां कई जगह पानी नहीं मिल पाता। मजबूरन ग्रामीण नालों और डोबरों से पानी निकालकर उसे छानकर पीने को मजबूर होते हैं। ऐसे पानी में मौजूद संक्रमित जीवाणु और बैक्टीरिया उनके स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। दूषित पानी और कुपोषण का असर बच्चों के स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।



ये भी पढ़ें-  इंदौर के बड़े होटल में खाद्य विभाग का छापा: बिना पैकिंग डेट के नॉनवेज मिला; किचन में कॉकरोच-चूहे भी मिले



44 मरीज बच्चों का अभी भी इलाज जारी


बालाघाट जिले में संक्रमण और कुपोषण के चलते सरकारी आंकड़ों के अनुसार आठ बच्चों ने अपनी जान गंवाई है। हालांकि, जमीनी स्तर पर आंकड़े इससे अलग होने का दावा किया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अब तक 207 लोगों का जिला चिकित्सालय में इलाज किया गया है, जिनमें से 163 मरीज स्वस्थ होकर डिस्चार्ज किए जा चुके हैं। वहीं, 44 मरीजों का अभी इलाज जारी है। स्वास्थ्य सर्वे के तहत अब तक 3,329 लोगों की जांच की जा चुकी है। स्वास्थ्य निगरानी के लिए 20 सर्वेक्षण टीमें घर-घर जाकर लोगों की जांच कर रही हैं। वहीं, उपचार के लिए 10 चिकित्सा अधिकारियों को नियुक्त किया गया है।



कोदो-कुटकी और जंगल से मिलने वाले खाद्य पदार्थों पर निर्भर जीवन


आदिवासी बैगा समुदाय का जीवन जंगलों से सीधे जुड़ा हुआ है। इनके खानपान में जंगलों से मिलने वाले कंद-मूल के अलावा कई प्रकार की सब्जियां और अन्य प्राकृतिक खाद्य पदार्थ शामिल हैं। इन्हीं के सहारे कई परिवार अपना जीवन यापन करते हैं। बैगा बहुल क्षेत्रों की परिस्थितियां इनके जीवन के अनुकूल हैं। जंगलों के अलावा यहां पहाड़ी इलाके भी हैं, जहां कुछ लोग जंगल साफ कर थोड़ी-बहुत खेती कर लेते हैं। इनमें कोदो-कुटकी जैसी फसलें प्रमुख हैं। हालांकि, यह इनके जीवनयापन के लिए पर्याप्त नहीं होतीं। ऐसे में शासन से मिलने वाला राशन इनके लिए मददगार साबित होता है और बाकी जरूरतों के लिए वे जंगलों पर निर्भर रहते हैं।