सऊदी में दफ्तर, पाकिस्तान के पास कमान! ग्राउंड पर कैसे काम करेगा ‘इस्लामिक NATO'? समझिए पूरी कहानी
Published: Tuesday, September 1, 2026, 20:25 [IST]
Islamic NATO Explained: पश्चिम एशिया में एक नए सैन्य गठजोड़ की तस्वीर अब धीरे-धीरे साफ हो रही है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच हुआ मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट अब संस्थागत रूप लेने की दिशा में बढ़ रहा है। सऊदी अरब में इसका स्थायी सचिवालय बनाने की तैयारी है, जबकि शुरुआती तीन साल महासचिव की जिम्मेदारी पाकिस्तान के पास रहेगी।
सामूहिक रक्षा के सिद्धांत ने इसे 'इस्लामिक NATO' की चर्चा के केंद्र में ला दिया है। हालांकि, अभी इसे NATO के बराबर मानना जल्दबाजी होगी। सवाल है कि सऊदी में दफ्तर और पाकिस्तान के नेतृत्व वाला यह ढांचा आखिर जमीन पर कैसे काम करेगा?
सऊदी में दफ्तर, पाकिस्तान के पास कमान
इस गठजोड़ का स्थायी सचिवालय सऊदी अरब में बनाया जा सकता है। खास बात यह है कि शुरुआती तीन साल महासचिव पाकिस्तान से होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि पाकिस्तान को तीनों देशों की सेनाओं की सीधी कमान मिल जाएगी। सचिवालय मुख्य रूप से तीनों देशों के रक्षा प्रतिष्ठानों के बीच समन्वय, बैठकों और साझा योजनाओं को आगे बढ़ाने वाला संस्थागत केंद्र होगा।
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क्यों कहा जा रहा 'इस्लामिक NATO'?
मक्का समझौते की सबसे अहम बात सामूहिक रक्षा का सिद्धांत है। इसके तहत किसी एक सदस्य देश पर सैन्य हमला तीनों देशों के खिलाफ हमला माना जाएगा। यही प्रावधान NATO के आर्टिकल 5 की याद दिलाता है। तुर्किए के रक्षा मंत्री ने भी तकनीकी तौर पर इसे NATO आर्टिकल 5 के समान बताया था। हालांकि दोनों गठबंधनों की सैन्य संरचना और क्षमताओं में बड़ा अंतर है।
सचिवालय करेगा क्या-क्या काम?
सऊदी अरब में बनने वाला सचिवालय तीनों देशों के बीच सैन्य सहयोग का कोऑर्डिनेशन हब बन सकता है। यहां रक्षा मंत्रालयों के बीच संपर्क और साझा योजनाओं पर काम होगा। संयुक्त सैन्य गतिविधियों की तैयारी, सैन्य अधिकारियों के बीच समन्वय, रक्षा तकनीक और हथियार उत्पादन में सहयोग जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाया जा सकता है। 31 अगस्त की पहली रणनीतिक बैठक में भी इंटरऑपरेबिलिटी और सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने पर चर्चा हुई।
क्या दूसरे मुस्लिम देश भी होंगे शामिल?
अभी यह गठजोड़ तीन देशों तक सीमित है, लेकिन इसका दायरा भविष्य में बढ़ सकता है। तुर्किए की ओर से संकेत दिया गया है कि यह ढांचा दूसरे मुस्लिम देशों के लिए भी खुल सकता है। अगर ऐसा होता है तो यह पश्चिम एशिया और मुस्लिम देशों के बीच सुरक्षा सहयोग का बड़ा मंच बन सकता है। हालांकि नए सदस्यों को शामिल करने की प्रक्रिया और सैन्य प्रतिबद्धताओं का स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं है।
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भारत और ईरान के लिए क्यों अहम?
क्षेत्र में अमेरिका-ईरान तनाव और खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताओं के बीच इस गठजोड़ का बनना महत्वपूर्ण है। समझौते में किसी देश को आधिकारिक दुश्मन नहीं बनाया गया है, लेकिन ईरान से जुड़े किसी बड़े संकट में इसकी भूमिका पर नजर रहेगी। भारत के लिए पाकिस्तान की नेतृत्वकारी भूमिका खास मायने रखती है। नई दिल्ली यह देखेगा कि यह गठजोड़ पश्चिम एशिया तक सीमित रहता है या दक्षिण एशिया की रणनीतिक स्थिति को भी प्रभावित करता है।