'पाकिस्तान बिकता नहीं, किराए पर चलता है': रिपोर्ट में बड़ा दावा, क्या अमेरिका को उल्लू बना रहा PAK?
पाकिस्तान की दोहरी विदेश नीति और आतंकवाद को लेकर उसके रवैये पर अमेरिका में फिर सवाल उठे हैं। अमेरिकी पत्रिका 'द नेशनल इंटरेस्ट' की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका वर्षों से यह गलती करता रहा कि वह पाकिस्तान को 'खरीद' सकता है, जबकि वास्तविकता यह है कि इस्लामाबाद किसी एक पक्ष का स्थायी सहयोगी नहीं, बल्कि अपने हितों के अनुसार किराए पर उपलब्ध रहने वाली शक्ति की तरह व्यवहार करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के लिए पाकिस्तान की यही नीति कभी-कभी रणनीतिक फायदा भी देती है, जबकि चीन को इस स्थिति से मजबूरी में समझौता करना पड़ रहा है।
रिपोर्ट में ईरान-अमेरिका संघर्ष का उदाहरण देते हुए कहा गया कि पाकिस्तान ने दोनों देशों से रिश्ते बनाए रखते हुए युद्धविराम कराने में भूमिका निभाई, जिससे कुछ समय के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य दोबारा खुल सका। रिपोर्ट का दावा है कि फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी यह भूमिका नहीं निभा सकते थे और यह काम केवल संतुलन साधने वाला देश ही कर सकता था। रिपोर्ट में पाकिस्तान की इसी रणनीति का दूसरा उदाहरण जून 2025 में अजरबैजान के साथ हुए करीब 4.6 अरब डॉलर के रक्षा समझौते को बताया गया। इसके तहत पाकिस्तान 40 जेएफ-17 लड़ाकू विमान अजरबैजान को देगा। रिपोर्ट के अनुसार, यह विमान चीनी डिजाइन, रूसी इंजन और पाकिस्तानी निर्माण का मिश्रण है, जिससे इस्लामाबाद चीन के साथ अपने संबंधों का आर्थिक लाभ भी उठा रहा है।
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अमेरिका से आर्थिक मदद की भी मांग
रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान संकट के दौरान मध्यस्थता करने के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका से अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए 10 अरब डॉलर का एक्सचेंज-स्थिरीकरण फंड बनाने की मांग भी की। रिपोर्ट का कहना है कि पाकिस्तान ने एक बार फिर अपनी भू-राजनीतिक अहमियत को आर्थिक सहायता में बदलने की कोशिश की, जबकि चीन से अपने रिश्ते भी बनाए रखे।
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आईएमएफ और विश्व बैंक को बताया अमेरिकी ताकत
रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका को पाकिस्तान की 'हेजिंग' यानी दोनों पक्षों के साथ संतुलन बनाकर चलने की नीति को बेहतर तरीके से समझना चाहिए। इसमें सुझाव दिया गया कि वाशिंगटन, आईएमएफ और विश्व बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर पाकिस्तान को अमेरिकी हितों की दिशा में झुकाने की कोशिश कर सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन पाकिस्तान को बड़े पैमाने पर सीधे आर्थिक सहयोग देने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर पाकिस्तान की निर्भरता अमेरिका के लिए प्रभाव बनाए रखने का सबसे बड़ा साधन है।
सीपीईसी छोड़ने की मांग अव्यावहारिक
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि पाकिस्तान से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) छोड़ने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है। इसके बजाय अमेरिका को यह देखना चाहिए कि पाकिस्तान चीन को अपने ऊपर पूरी तरह हावी नहीं होने देता और दोनों महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखता है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यदि अमेरिका व्यावहारिक शर्तों के साथ सैन्य और आर्थिक सहयोग बढ़ाए, तो पाकिस्तान की संतुलन साधने वाली नीति को अपने रणनीतिक हित में बदल सकता है।