हो गई शुरुआत! बदलने जा रहा है PIN कोड, अब 4 मीटर तक मिलेगी सटीक लोकेशन
भारत में DIGIPIN डिजिटल एड्रेस सिस्टम की शुरुआत पायलट स्तर पर हो रही है, जो 4 मीटर तक सटीक लोकेशन पहचानने में मदद करेगा। जानिए यह 10-कैरेक्टर कोड आखिर कैसे काम करता है।
भारत में पते की पहचान का तरीका बदलने की तैयारी लंबे वक्त से चल रही है और यह प्लान अब जमीन पर उतरने लगा है। भारतीय डाक विभाग के नए DIGIPIN सिस्टम की शुरुआत के लिए बेंगलुरु को पायलट शहर के तौर पर चुना गया है, जहां आने वाले महीनों में डाक और कूरियर डिलीवरी के लिए इसकी टेस्टिंग शुरू करने की तैयारी है। DIGIPIN, IIT हैदराबाद और NRSC-ISRO के सहयोग से डिवेलप एक जियो-कोडेड डिजिटल एड्रेस सिस्टम है, जो ट्रेडिशनल एड्रेस के बजाय किसी जगह को लगभग 4 मीटर × 4 मीटर के डिजिटल ग्रिड के रूप में पहचान सकता है। आइए इसके बारे में विस्तार से बताते हैं।
आखिर क्या है DIGIPIN टेक्नोलॉजी?
भारत में किसी व्यक्ति का पता आमतौर पर मकान नंबर, गली, मोहल्ला, गांव, शहर और PIN Code से पहचाना जाता है। लेकिन ऐसे पते मशीन के लिए हमेशा आसान नहीं होते। कई जगह एक जैसे मोहल्ले के नाम होते हैं, घरों के नंबर स्पष्ट नहीं होते या डिलीवरी एजेंट को ‘मंदिर के पीछे’ जैसे लैंडमार्क पर निर्भर रहना पड़ता है। इसी समस्या को तकनीक के जरिए हल करने के लिए भारत में DIGIPIN यानी Digital Postal Index Number विकसित किया गया है।
नए 10-कैरेक्टर वाले इस अल्फान्यूमेरिक कोड की मदद से डिलीवरी एजेंट को गली, मोहल्ले और लैंडमार्क पर कम निर्भर रहना पड़ सकता है। बेंगलुरु में प्रस्तावित पायलट के बाद दूसरे महानगरों और आगे चलकर ग्रामीण क्षेत्रों में भी इसके टेस्ट और विस्तार की योजना बताई गई है। डाक विभाग ने इसे IIT Hyderabad और NRSC, ISRO के सहयोग से तैयार किया है। यह एक जियो-कोडेड एड्रेसिंग सिस्टम है, यानी यहां पते की पहचान नाम या गली से नहीं, बल्कि किसी जगह की भौगोलिक स्थिति से होती है।
ऐसे तैयार होता है किसी जगह का DIGIPIN
DIGIPIN टेक को आसान भाषा में समझें तो भारत के पूरे भौगोलिक क्षेत्र पर एक विशाल डिजिटल ग्रिड बिछाया गया है। इसके बाद इस ग्रिड को लगातार छोटे हिस्सों में बांटा जाता है। आखिर में लगभग 4 मीटर × 4 मीटर के एक छोटे क्षेत्र तक पहुंचकर उस जगह को एक यूनिक पहचान मिलती है। यानी जहां पारंपरिक PIN Code एक बड़े इलाके या डाक वितरण क्षेत्र की पहचान करता है, वहीं एक DIGIPIN लगभग 4 मीटर × 4 मीटर के छोटे भू-भाग को पहचान सकता है। इसी वजह से इसे सटीक डिजिटल लोकेशन रेफरेंस सिस्टम माना जा रहा है।
यानी DIGIPIN का आधार किसी व्यक्ति का नाम, घर का नंबर या सड़क का नाम नहीं है। इसका आधार है Latitude और Longitude। जब किसी स्मार्टफोन या दूसरे GNSS-इनेबल्ड डिवाइस से किसी जगह की भौगोलिक लोकेशन मिलती है, तो सिस्टम उन को-ऑर्डिनेट्स को DIGIPIN के नियमों के हिसाब से एक 10-character alphanumeric code में बदल देता है। यही कोड उस लोकेशन का डिजिटल रेफरेंस बन जाता है।
इन लोगों को मिलेगा DIGIPIN का सीधा फायदा
नए DIGIPIN का सबसे बड़ा फायदा उन जगहों पर हो सकता है जहां एड्रेस साफ नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र, नई कॉलोनियां, दूरदराज के इलाके, जंगल या ऐसी जगहें जहां कोई सटीक घर का पता नहीं है, वहां जियोग्राफिक कोड ज्यादा काम का साबित हो सकता है। इसका इस्तेमाल भविष्य में लॉजिस्टिक्स, ई-कॉमर्स डिलिवरी, सरकारी सेवाओं, इमरजेंसी रिस्पॉन्स और नेविगेशन जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है। डाक विभाग इसे व्यापक डिजिटल एड्रेस इकोसिस्टम और एड्रेस एज अ सर्विस की फाउंडेशन लेयर के रूप में देख रहा है।
बताते चलें, DIGIPIN को पुराने पते और PIN कोड की जगह लेने के बजाय एक एक्सट्रा डिजिटल एड्रेस लेयर के तौर पर विकसित किया गया है। यानी भविष्य में किसी पते के साथ मकान नंबर, गली, शहर और PIN कोड के अलावा DIGIPIN जैसी सटीक जियोग्राफिक पहचान भी यूज की जा सकती है।