नागपुर हाई कोर्ट का सख्त संदेश: नोटशीट पर मंजूरी देना और अदालती आदेश जारी करना दो अलग बातें!| Navbharat Live
नागपुर हाई कोर्ट का सख्त संदेश: नोटशीट पर मंजूरी देना और अदालती आदेश जारी करना दो अलग बातें!
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Written By:
अंकिता पटेल
Updated On: Jul 31, 2026 | 12:48 PM IST
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सार
Education Department Delay: नागपुर हाई कोर्ट ने शिक्षा विभाग के पांच साल से लंबित मामले पर सख्त टिप्पणी करते हुए शिक्षा सचिव की माफी स्वीकार की और विभागीय कार्रवाई के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी।

नागपुर हाई कोर्ट (सोर्स- सोशल मीडिया)
विस्तार
Nagpur High Court Order: शिक्षा विभाग में पिछले पांच सालों से लंबित मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए नागपुर हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि विभागीय नोटशीट को मंजूरी देना और अदालत के निर्देशों के तहत आधिकारिक आदेश जारी करना दो अलग बातें हैं। हाई कोर्ट ने राज्य के स्कूली शिक्षा विभाग के सचिव रणजीत सिंह देओल द्वारा दिए गए आश्वासन और मांगी गई माफी को स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के अपने आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी।
शिक्षा विभाग के उपसंचालक द्वारा 26 अक्टूबर 2021 को भेजे गए पत्र पर पांच वर्षों तक कोई निर्णय नहीं लिया गया था। अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद शिक्षा सचिव ने स्वयं निर्णय लेने के बजाय काम उप सचिव को सौंप दिया था।
कोर्ट ने पहले सचिव के नियुक्ति प्राधिकारी को ‘महाराष्ट्र शासकीय कर्मचारियों के तबादलों का विनियमन और शासकीय कर्तव्यों के संपादन में विलंब का प्रतिबंध अधिनियम, 2005’ की धारा 10 के तहत विभागीय जांच और वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में प्रविष्टि का आदेश दिया था।
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हाई कोर्ट की फिर कड़ी आपत्ति
सुनवाई के दौरान एजीपी ने उप सचिव द्वारा जारी 27 जुलाई 2026 का एक पत्र अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया। इसमें कहा गया कि 29 अक्टूबर 2021 के प्रतिवेदन पर निर्णय ले लिया गया है। इस पर हाई कोर्ट ने फिर से कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि 7 जुलाई के आदेश में विशेष रूप से शिक्षा सचिव को निर्णय लेने का निर्देश दिया गया था और ‘अधिनियम, 2005 की धारा 10 का ध्यान दिलाया गया था।
इसके बावजूद सचिव ने स्वयं निर्णय लेने के बजाय यह कार्य उप सचिव को सौंप दिया और यह भी नहीं बताया कि उनके खिलाफ धारा 10 के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए। अदालत ने इसे अवमाननाजनक मानते हुए पहले सत्र में आदेश दिया कि सचिव के नियुक्ति प्राधिकारी धारा 10(2) व 10(3) के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करें और उनकी सेवा पुस्तिका में कर्तव्य में लापरवाही की प्रविष्टि दर्ज करें तथा 6 सप्ताह में रिपोर्ट पेश करें।
भविष्य में नहीं दोहराई जाएगी ऐसी गलती
अवमानना के मुद्दे पर सुनवाई के लिए मामला दोपहर 2:30 बजे दोबारा रखा गया। स्कूली शिक्षा विभाग के सचिव रणजीत सिंह देओल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुए। उन्होंने सफाई दी कि उन्हें लगा कि ‘महाराष्ट्र मैनुअल ऑफ ऑफिस प्रोसीजर 2023’ के तहत वह नोटशीट को मंजूरी दे सकते हैं और आदेश उनके मातहत अधिकारी (उप सचिव) द्वारा सूचित किया जा सकता है।
इस पर कोर्ट ने वैधानिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि जब अदालत किसी विशिष्ट अधिकारी को आदेश का पालन करने का निर्देश देती है तो केवल वही अधिकारी आदेश पारित करने के लिए अधिकृत होता है।
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जब कानून किसी विशेष अधिकारी द्वारा निर्णय लेने का प्रावधान करता है तो आदेश उसी अधिकारी द्वारा पारित किया जाना चाहिए,
शिक्षा सचिव रणजीत सिंह देओल ने अदालत को आश्वस्त किया कि भविष्य में ऐसी गलती दोहराई नहीं जाएगी और अपनी भूल के लिए माफी मांगी। हाई कोर्ट ने उनके आश्वासन पर माफी स्वीकार कर ली और उन्हें 7 जुलाई 2026 के आदेश का पूरी तरह पालन करने का एक और मौका दिया।
