भारत: आन्ध्र प्रदेश में मैन्ग्रोव बने तटीय सुरक्षा कवच

भारत: आन्ध्र प्रदेश में मैन्ग्रोव बने तटीय सुरक्षा कवच

कृष्णा तट पर बसे संगमेश्वरम गाँव का जीवन हमेशा से समुद्र और तट की रक्षा करने वाले मैन्ग्रोव वनों से जुड़ा रहा है.

गाँव में 1977 के विनाशकारी दिविसीमा चक्रवात की यादें आज भी ताज़ा हैं. उस त्रासदी ने गाँव की 68 वर्षीय निवासी विश्वनाथपल्ली लक्ष्मी को मैन्ग्रोव वनों की अहमियत का अहसास कराया.

उन्होंने कहा, “चक्रवात के दौरान दिविसीमा के लगभग 31 गाँव जलमग्न हो गए थे. प्राकृतिक सुरक्षा कवच न होने के कारण समुद्री पानी भीतर तक पहुँच गया और हज़ारों लोगों की जान व आजीविकाएँ चली गईं.”

उन्होंने कहा, “इसके बाद जहाँ भी मैन्ग्रोव वन पनपे, वहाँ तूफ़ानों का असर कम हुआ. अब लोग इन्हें केवल पेड़ नहीं, बल्कि अपना रक्षक मानते हैं.”

समय के साथ गाँव और समुद्र के बीच फैले कई मैन्ग्रोव वन सिकुड़ते गए या पूरी तरह ग़ायब हो गए. उनकी जगह गाद और नमक से प्रभावित बंजर मैदान रह गए.

अब एक-एक पौधे के साथ मैन्ग्रोव फिर लौट रहे हैं और हालात धीरे-धीरे बदल रहे हैं.

© UNDP India/Samuel Bathula भारत के आन्ध्र प्रदेश के संगमेश्वरम गाँव की निवासी, विश्वनाथपल्ली लक्ष्मी.

मैन्ग्रोव की वापसी

दरअसल संगमेश्वरम जैसे तटीय समुदायों के लिए मैन्ग्रोव बेहद अहम हैं. वे तटीय कटाव और तूफ़ानी लहरों का असर कम करने के साथ-साथ मछलियों के प्रजनन के लिए अनुकूल वातावरण बनाते हैं और स्थानीय आजीविकाओं को सहारा देते हैं.

अब ECRICC (Enhancing Climate Resilience of India’s Coastal Communities) परियोजना के तहत इन वनों को बहाल किया जा रहा है. इसका उद्देश्य भारत के तटीय समुदायों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में सक्षम बनाना है.

भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के नेतृत्व में चल रही इस परियोजना को हरित जलवायु कोष, भारत में UNDP और आन्ध्र प्रदेश के पर्यावरण एवं वन विभाग का सहयोग प्राप्त है.

उपग्रह चित्रों और जल-वैज्ञानिक आकलनों की मदद से बहाली के लिए उपयुक्त स्थानों की पहचान की गई. इसके ज़रिए कृष्णा वन्यजीव अभयारण्य में अब तक 694 हैक्टेयर क्षतिग्रस्त दलदली भूमि को बहाल किया जा चुका है.

समुद्री जल का प्राकृतिक प्रवाह फिर शुरू करने और मैन्ग्रोव को उगने में मदद देने के लिए ‘फ़िश-बोन’ कहे जाने वाले संकरे ज्वारीय मार्ग भी दोबारा खोले गए हैं.

© UNDP India/Samuel Bathula भारत के आन्ध्र प्रदेश में GCF ECRICC परियोजना के तहत मैन्ग्रोव बहाली में भाग लेते समुदाय के सदस्य.

तट के संरक्षक

वन अधिकारियों, पारिस्थितिकी विशेषज्ञों और स्थानीय मछुआरा समुदायों ने मिलकर स्थानीय लवणता और ज्वार के अनुकूल देशी मैन्ग्रोव पौधे लगाए हैं.

कृष्णा वन्यजीव अभयारण्य में वन सहायक शेख नागुल मीरा ने कहा, “हमारे लिए मैन्ग्रोव केवल पेड़ नहीं, बल्कि जीवन का स्रोत हैं.”

उन्होंने कहा, “ये केकड़ों, झींगों और मछलियों की अनेक प्रजातियों के लिए प्रजनन स्थल हैं, जिन पर हमारी आजीविका निर्भर है. स्वस्थ मैन्ग्रोव का मतलब है अधिक मछलियाँ, परिवारों के लिए बेहतर आमदनी और बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित भविष्य.”

बहाली के पीछे विज्ञान

मैन्ग्रोव की बहाली चेन्नई स्थित राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबन्धन केन्द्र के साथ तैयार किए गए स्थान-विशिष्ट दिशानिर्देशों के अनुसार की जा रही है. इसमें वैज्ञानिक शोध और स्थानीय ज्ञान, दोनों का इस्तेमाल किया गया है.

आन्ध्र प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक और वन बल प्रमुख डॉक्टर पी वी चलपति राव ने कहा, “मैन्ग्रोव की सफल बहाली के लिए केवल पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं है.”

उन्होंने कहा कि हर स्थान की पारिस्थितिक परिस्थितियों और क्षरण के कारणों को समझना ज़रूरी है, ताकि जैव विविधता, आजीविकाओं एवं तटीय समुदायों की बेहतर रक्षा की जा सके.

© UNDP India/Samuel Bathula आन्ध्र प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख, IFS अधिकारी डॉक्टर पी वी चलपति राव ने क्षतिग्रस्त मैन्ग्रोव की बहाली में सहयोग दिया.

भावी पीढ़ियों के लिए उम्मीद

मैन्ग्रोव वनों की वापसी के साथ स्थानीय मछुआरा परिवार अब इन्हें साझा विरासत के रूप में देखने लगे हैं, जो उनके घरों और आजीविकाओं की रक्षा करती है और भविष्य के जलवायु जोखिमों से निपटने में मदद देती है.

लक्ष्मी के लिए इन वनों की बहाली इस उम्मीद का प्रतीक है कि आने वाली पीढ़ियाँ, लगभग पाँच दशक पहले चक्रवात झेलने वाले लोगों की तुलना में अधिक सुरक्षित होंगी.

ECRICC परियोजना प्रकृति-आधारित समाधानों के ज़रिए भारत के तटीय क्षेत्रों की रक्षा व बहाली और समुदायों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुरूप ढलने में मदद कर रही है.

यह लेख पहले यहाँ प्रकाशित हुआ.