एक पत्र – मेरे स्वर्गवासी पिताजी के नाम

Hindi Kahani: आदरणीय पिताजी, सादर प्रणाम।

आज आपको इस दुनिया से गए कई वर्ष हो गए हैं, लेकिन ऐसा एक भी दिन नहीं बीता जब आपकी स्मृतियाँ मन में न आई हों। समय आगे बढ़ गया है, पर आपके जाने से जो रिक्तता उत्पन्न हुई, वह आज भी यथावत है। मन में अनेक भाव और बातें हैं, जिन्हें काश एक बार आपके समक्ष बैठकर व्यक्त कर पाती। इसी कारण आज यह पत्र लिख रही हूँ।
पिताजी, समाज में लोग प्रायः यह कहा करते थे कि आपके घर में पुत्र नहीं है, केवल दो पुत्रियाँ हैं। अनेक प्रकार की सामाजिक टिप्पणियाँ भी सुनने को मिलीं, परंतु आपने कभी हमें यह अनुभव नहीं होने दिया कि हम किसी से कम हैं। आप सदैव मुस्कुराकर कहते थे, "तू मेरी बेटी भी है और पुत्तर भी।" आपके ये शब्द आज भी मेरी सबसे बड़ी शक्ति हैं। आपने हमें यह सिखाया कि बेटियाँ भी प्रत्येक उत्तरदायित्व का निर्वहन कर सकती हैं और अपने सभी सपनों को साकार कर सकती हैं।
आपके निधन के पश्चात ऐसा प्रतीत हुआ मानो हमारे जीवन से एक सुदृढ़ वटवृक्ष की छाया हट गई हो। आपने अपने उसी "पुत्तर" के कंधों पर अनेक दायित्व सौंप दिए। कई बार परिस्थितियाँ अत्यंत कठिन हो जाती हैं और मन थक जाता है। ऐसे क्षणों में आपकी अत्यंत स्मृति आती है। मन में यह भावना उत्पन्न होती है कि काश आप एक बार पुनः सिर पर हाथ रखकर कहते- "हिम्मत मत हार, मेरा पुत्तर सब संभाल लेगा।"
आपके जाने के बाद माँ ने जिस धैर्य और साहस का परिचय दिया, वह वास्तव में अनुपम है। उन्होंने मातृत्व के साथ-साथ पितृत्व के दायित्वों का भी पूर्ण निष्ठा से निर्वहन किया। मेरी विवाह प्रक्रिया को संपन्न कर उन्होंने वह कर्तव्य भी निभाया, जो प्रत्येक पिता अपनी पुत्री के लिए करना चाहता है। उस दिन आपकी अनुपस्थिति सर्वाधिक अनुभव हुई, किंतु माँ में ही मुझे आपका प्रतिबिंब दिखाई दिया।
आज भी जब कोई कहता है, "तुम्हारे पिताजी अत्यंत सज्जन और आदर्श व्यक्ति थे," तो मेरी आँखें नम हो जाती हैं और साथ ही गर्व से हृदय भर उठता है। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं ऐसे पिता की पुत्री हूँ, जिन्होंने ईमानदारी, सादगी और मानवता की ऐसी अमूल्य विरासत प्रदान की, जिसे आज भी लोग सम्मानपूर्वक स्मरण करते हैं। पिताजी, आपके स्थान की पूर्ति इस संसार में कोई नहीं कर सकता। जीवन आगे बढ़ना तो सिखा देता है, परंतु पिता के अभाव को कभी पूर्ण नहीं कर पाता। आपकी स्मृतियाँ मेरी सबसे अनमोल धरोहर हैं और आपके संस्कार मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हैं। 
मैं यह संकल्प लेती हूँ कि जिस विश्वास के साथ आपने मुझे अपना "पुत्तर" कहा था, उस विश्वास को कभी टूटने नहीं दूँगी। आपके आदर्शों और संस्कारों को अपने जीवन के प्रत्येक कर्म में जीवित रखूँगी, ताकि जहाँ भी आप हों, अपनी दोनों पुत्रियों पर गर्व कर सकें। ईश्वर से प्रार्थना है कि आपकी पावन आत्मा को सदैव शांति प्रदान करें। आप भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, परंतु मेरी प्रत्येक प्रार्थना, प्रत्येक मुस्कान और प्रत्येक उपलब्धि में सदैव विद्यमान रहेंगे। 


आपकी वही "पुत्तर"