ब्लैकबोर्ड- चुस्त कपड़ों के ऊपर बुर्का पहनकर बार जाती हूं: रात तीन बजे घर पहुंची तो भाई बोला- किसके साथ करवाचौथ मनाकर आई है
2007-08 की बात है। दिसंबर का महीना था। कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। मैं नाइट ड्यूटी पर थी। रात के करीब एक बज रहे थे।
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सारे गेस्ट नशे में झूम रहे थे। तभी लेडीज वॉशरूम से एक लड़की के चीखने की आवाज आई। मैं भागकर अंदर पहुंची तो देखा नशे में धुत एक लड़का वॉश बेसिन के बगल में बैठा घुर्रा रहा था। उससे शराब की तेज बदबू आ रही थी।
मैंने उससे कहा- ये लेडीज वॉशरूम है। यहां से बाहर चलिए। वो मेरी तरफ देखकर हंसा, लेकिन जस का तस बैठा रहा। मैंने दो-तीन बार यही बात दोहराई, लेकिन वो निकलने को तैयार नहीं हुआ। जब बात से बात नहीं बनी तो मैंने उसका कॉलर पकड़ा और झटके से वॉशरूम से बाहर की तरफ खींचने लगी।
वो भी अड़ा रहा और गालियां देते हुए बोला- @#$% तूने मुझे हाथ कैसे लगाया। उसने पूरी ताकत से मुझे दो थप्पड़ जड़ दिए। मेरे गालों पर उसकी उंगलियां छप गईं और कुछ देर के लिए कान बंद हो गए।
तभी पीछे से कुछ और लोग वहां पहुंचे। उस लड़के को पीटकर वॉशरूम से बाहर निकाला और उठाकर सड़क पर फेंक दिया। मैं कई बार ऐसे लोगों से निपट चुकी हूं। मैं यानी मेहरूनिशा…फीमेल बाउंसर मेहरूनिशा।
ब्लैकबोर्ड में इसबार मैं नीरज झा लाया हूं कहानी फीमेल बाउंसर्स की…
मेहरूनिशा बताती हैं- 'दिल्ली की रहने वाली हूं। इन दिनों बार में ड्यूटी है। मेरा ये किस्सा यहीं खत्म नहीं हुआ। जिन लोगों ने उस शराबी को बाहर फेंका था, वो सभी मेरे साथी बाउंसर थे, लेकिन मर्द बाउंसर। उन्होंने काम निपटाकर मुझ पर तंज कसा- ‘मैडम, इतना आसान नहीं बाउंसर बनना। लेडी बाउंसर हो तो क्या, लड़कों से पाला तो पड़ेगा ही।’
दुनिया से रोज ऐसे ही लड़ना पड़ता है। लेकिन अब तकलीफ नहीं होती। ये सोचकर चुप रहती हूं कि लोग तो बोलेंगे ही। सबका मुंह तो बंद नही कर सकती और न ही ये मेरे घर की दाल-रोटी चलाते हैं। जिल्लत तो घर पर झेलनी पड़ती है।'

लेडी बाउंसर मेहरूनिशा कहती हैं कि बाहर की दुनिया से ज्यादा बेइज्जती तो घर में ही होती है।
मैंने पूछा- 'आप बाउंसर कैसे बनी?'
मेहरूनिशा बोलीं, ‘2002 की बात है। हम 4 बहन, 2 भाई थे। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में रहते थे। मैं 13 साल की थी। औरतों को घर से निकलना मना था। मैं आगे पढ़ना चाहती थी, लेकिन अब्बू का कहना था कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ाना ठीक नहीं होता। औरत की कमाई मर्द खाए, ये हराम है।
घर के पास मिलिट्री स्टेशन था। बचपन में जब फौजियों को देखती थी तो बड़े होकर आर्मी में भर्ती होने के बारे में सोचती थी। बचपन से मेरा शरीर हट्टा-कट्टा था। भाइयों के कपड़े पहन लेती थी तो लोग मुझे लड़का समझ लेते थे। जब दसवीं क्लास में थी, तो पता चला कि आर्मी में भर्ती के लिए फॉर्म भरना पड़ता है। एक दिन चुपके से फॉर्म खरीदकर लाई, लेकिन अब्बू को पता चल गई।
उन्होंने फॉर्म फाड़ दिया। मुझ पर चीखने लगे। कहने लगे- मेरे जिंदा रहते तो ये नहीं हो सकता। अब तुम्हारी शादी करा दूंगा। जैसे ही मैनें 12वीं पास की अब्बू ने मेरी और बड़ी बहन की शादी तय कर दी। तब बड़ी बहन 18 साल की थी और मैं 16 साल की। जिस दिन लड़के वाले आने को थे, उसी दिन मेरी तबीयत खराब हो गई। मुझे टायफाइड हो गया।
लड़के वालों को लगा कि टीबी की मरीज हूं। इसलिए रिश्ते से इनकार कर दिया। बहन की शादी हो गई, लेकिन कुछ महीने बाद ही उसके ससुराल वाले दहेज मांगने लगे। हर महीने पैसे देने के लिए कहते थे। जब अब्बू के पास पैसे नहीं होते थे, वो लोग बहन को पीटते थे। तलाक की धमकी देते थे।
अब्बू की सहारनपुर सिटी में कई दुकानें थीं। आज उनकी कीमत 50 लाख होगी। लेकिन बहन के लिए अब्बू ने उनमें से 4 दुकानों को एक-एक लाख रुपए में बेच दिया। सारा पैसा उन्होंने दामाद को दे दिया, फिर भी बहन का घर नहीं बचा पाए। उनका रवैया नहीं बदला, आखिरकार तलाक हो गया।'
'फिर आप दिल्ली कब आईं?'
‘2002-03 में। अब्बू का इंटीरियर डिजाइनिंग का काम था। इससे पहले वो ट्रक चलाने से लेकर कपड़े बेचने तक का काम कर चुके थे। अपने एक दोस्त की बातों में आकर पापा ने कमेटी में पैसे लगा दिए। वो सारा पैसा डूब गया। सारी जमीनें बिक गईं। तब हमें सहारनपुर छोड़कर दिल्ली आना पड़ा।
तबसे अब्बू की तबीयत बहुत खराब रहने लगी। कोई कमाने वाला नहीं रहा। भाई शादी के बाद अपनी बीवी के साथ अलग रहने लगा। घर कैसे चलता। पड़ोस में एक भैया रहते थे। वो बाउंसर थे, लेकिन उस वक्त तो कोई बाउंसर जानता भी नहीं था। इसलिए सब सिक्योरिटी गार्ड कहते थे।
एक रोज मैंने उनसे पूछा- क्या मैं भी ये बाउंसर बन सकती हूं। शरीर तो हट्टा-कट्टा था ही। सुनते ही उन्होंने कहा- इवेंट मैनेजमेंट वाले से मिल लो। जरूरत होगी तो रख लेंगे। आखिर मुझे वहां नौकरी मिल गई। शुरुआत में जब कोई इवेंट होता तभी काम मिलता। दिन के 200-300 रुपए मिलते थे। सिर्फ अम्मी को पता था कि मैं बाउंसर बन चुकी हूं।
ड्यूटी के लिए चुस्त काली पैंट और टी-शर्ट या शर्ट पहननी पड़ती थी। शुरुआत में ये कपड़े मुझे बहुत अजीब लगते थे। मैंने इतने चिपके हुए कपड़े पहले कभी नहीं पहने थे। लेकिन असली परेशानी इन कपड़ों में घर से बाहर निकलने की थी। इन कपड़ों में घर से निकलती, तो पूरे मोहल्ले में बातें शुरू हो जातीं। इसलिए ड्यूटी वाले कपड़ों के ऊपर बुर्का पहनकर घर से निकलती थी। साइट पर पहुंचते ही बुर्का उतार देती और अपने काम में लग जाती।

मेहरूनिशा कहती हैं कि लोग मुझे देखकर कहते हैं औरत है या मर्द पता ही नहीं चलता, कहीं किन्नर तो नहीं।
लगातार 12-14 घंटे खड़े रहना पड़ता था। पूरा शरीर टूट जाता था। मेल और फीमेल बाउंसर को पैसे भी बराबर नहीं मिलते थे। खाना भी अलग-अलग मिलता था। मेल बाउंसर को कोरमा-बिरयानी और लेडी बाउंसर को दाल-चावल, कद्दू की सब्जी। मैं हल्ला करने लगी कि ऐसा नहीं चलेगा। हम दोनों बाउंसर हैं, दोनों को खाना तो कम से कम एक जैसा मिले।
ड्यूटी के बाद जब घर आती तो सब यही पूछते इतनी रात तक कहां रहती हो। पड़ोसी और रिश्तेदार अम्मी-अब्बू से पूछने लगे कि आपकी बेटी धंधा करने तो नहीं जाती है। अब्बू रात के एक-दो बजे तक जागते रहते थे। बालकनी में बैठकर मेरी राह देखते थे।
एक बारकी बात है, करवाचौथ पर दिल्ली में एक इवेंट था। वहां सभी कपल ही थे। मुझे तब ठीक से पता भी नहीं था कि करवाचौथ होता क्या है। सुबह करीब 10 बजे घर से निकली, काम खत्म होते-होते रात के 3 बज गए।
उधर घर पर भाई बार-बार अम्मी से पूछ रहा था- ‘ये रोज-रोज इतनी रात तक कहां रहती है?’ आज करवाचौथ मनाने गई है क्या?’
मैं जब घर लौटी तो अब्बू ने बुला लिया। कहने लगे आज तो तुझे बताना ही पड़ेगा कि क्या काम करती है। आखिरकार मैंने बता दिया कि बाउंसर हूं। भाई को पता चला तो वो कहने लगा- वहां तो लोग शराब पीते हैं। लड़कियों के साथ डांस करते हैं।
मैं उन्हें समझाया कि जैसे बाकी काम हैं। वैसे ही ये भी काम है। फैमिली बार में काम करती हूं। लोग अपने परिवार के साथ आते हैं। मेहनत से पैसे कमा रही हूं, इसमें गलत क्या है। धीरे-धीरे घरवालों को मेरी बात समझ आई और उन्होंने सवाल उठाने बंद कर दिए।
जब ये बात रिश्तेदारों को पता लगी तो कहने लगे- बेटी बार में काम करती है, बाप कमाई खाता है। मजहब भ्रष्ट कर दिया।
एकबार मोहल्ले में लोगों से मिलने के लिए एक नेता आए। उसी वक्त मैं घर से निकल रही थी। मुझे देखते ही बोले- तुम तो बार में काम करती हो। बार की लड़कियां तो धंधा करती हैं। मैंने कहा- ‘चलिए आज मेरे साथ बार। वहीं, बैठकर देखिएगा मैं क्या काम करती हूं। बार-क्लब में काम करने वाली हर लड़की धंधा करने वाली नहीं होती है।’
मेहरूनिशा की बात पूरी होती उससे पहले मैंने पूछ लिया- आपने शादी नहीं की?
वो थोड़ी देर के लिए रुकीं। फिर इशारों में बोलीं- ‘घर में देखा कि शादी के बाद क्या होता है। कभी ख्याल ही नहीं आया कि शादी करूं। जब भाई अम्मी-अब्बू को छोड़कर अलग रहने लगे, तब लगा कि मैं शादी करके चली जाऊंगी, तो अब्बू का क्या होगा।
2025 के नवंबर में अम्मी तो चल बसीं। अब्बू अकेले हो गए। इसलिए कभी सोचा नहीं। और अब तो 40 साल की हो गई हूं।’
मेहरूनिशा के बाद मैं अगली सुबह जनपथ पहुंचा। वहां मेरी मुलाकात रेश्मा से हुई। वो भी बाउंसर हैं…
35-37 साल की रेश्मा पिंक कलर का सलवार-सूट पहने हुए हैं। वो अपने दो बच्चे और अम्मी के साथ यहां रहती हैं।
मैंने नजरें घुमाकर जैसे ही घर को देखा, वो बोलीं- ‘यह सर्वेंट क्वार्टर है। जब तक अम्मी कोठियों में खाना, चूल्हा-चौका करती रहेंगी, तब तक घर हमारा रहेगा। 2022 में पति की मौत न हुई होती, तो मैं कभी बाउंसर न बनती। ये काम करने का शौक किसे होता है, लेकिन अब तो खुशी-खुशी करना पड़ता है। इसी से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, दाल-रोटी चल रही है।
मैं तो बिहार के गया जिले की रहने वाली हूं। 2015 के आसपास अब्बू ने शादी कर दी। पति इलेक्ट्रीशियन था। शादी के तीन साल बाद उनके मुंह में एक घाव हो गया। पहले लगा कि ठीक हो जाएगा, लेकिन धीरे-धीरे वो बढ़ता चला गया। जांच में पता चला कि कैंसर है। करीब तीन साल तक इलाज चला, लेकिन वो नहीं रहे।
पति की मौत के 8-9 महीने बाद तक मैं अपने ससुराल में ही रही। किसी ने मेरी खोज-खबर नहीं ली। दो-दो बच्चे, उनकी पढ़ाई-लिखाई से किसी को मतलब नहीं था। आखिर मैं वहां से दिल्ली आ गई मम्मी-पापा के पास। मां जनपथ इलाके की कोठियों में खाना बनाने का काम करती थीं।
मैंने मां से कहा- तुम्हारे साथ मैं भी यही काम करूंगी। वो गुस्से में बोली- कुछ और काम करो। मैं अपनी बेटी को ये सब करते हुए नहीं देख सकती। फिर मैं दूसरा काम ढूंढने लगी। इसी बिल्डिंग में इवेंट कंपनी में काम करने वाली एक लड़की रहती थी। मैंने उससे पूछा कि मुझे भी कोई नौकरी मिल सकती है। उसने लेडी बाउंसर की नौकरी दिलवा दी।

रेश्मा कहती हैं पति की मौत के बाद बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं था, इसलिए बाउंसर बन गई।
रेश्मा आगे बताती हैं शुरू में जब बार गई तो देखा- लड़के-लड़कियां पी कर बदहवास हैं। तब सोचती थी- मैंने तो शराब को कभी हाथ नहीं लगाया। आज ये दिन देखने पड़ रहे हैं। नौकरी का पहला दिन था, एक कस्टमर ने शराब का गिलास थमा दिया। मैंने गुस्से में हाथ झटक कर कह दिया- ‘ये सब मेरा काम नहीं है। शराब को हाथ भी नहीं लगाती।’
मैं आफ्टर नाइट बार में काम करती हूं। वो रात के एक-डेढ़ बजे के बाद शुरू होता है। लोग पूरी-पूरी रात शराब पीते हैं। कई लोग तो सुबह 6 बजे तक भी बार से नहीं निकलते हैं। एकबार एक लड़की ने इतनी शराब पी कि उसे समय का अंदाजा ही नहीं रहा। सुबह के करीब 7 बज चुके थे।
मैंने उससे कहा- मैडम, अब बार बंद करने का समय हो गया है। आप घर जाइए।
वो गाली देते हुए बोली- ‘@#*% तुम जानती नहीं हो कि मैं कौन हूं? लॉयर हूं, घसीटकर कोर्ट में ले जाऊंगी।’ मैंने कहा- लॉयर अपने कोर्ट में होगी। मैं यहां की बाउंसर हूं। उठाकर बाहर फेंक दूंगी। हम दो लोगों ने उसके हाथ-पैर पकड़े और बाहर कर दिया।'
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