महाभियोग: अब जज नहीं तो पद से किसे हटाएगी संसद? जस्टिस यशवंत वर्मा को लेकर बड़ा सवाल

समिति ने जांच रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोप सही पाए हैं
अब न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा न्यायाधीश नहीं हैं तो उनके खिलाफ महाभियोग को संसद कैसे अंजाम देगी. आखिर पद से कैसे हटाएगी जब पद पर वो हैं नहीं, क्योंकि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम-1968 में पूरी प्रक्रिया न्यायाधीश के खिलाफ है. जैसे ही न्यायाधीश इस्तीफा देते हैं, वो इसके दायरे से बाहर हो जाते हैं. खास बात ये है कि न्यायाधीशों के इस्तीफे को राष्ट्रपति द्वारा स्वीकार किए जाने की कोई शर्त भी नहीं लगता. ऐसे में न्यायमूर्ति वर्मा इस्तीफा देकर पद से हटाए जाने की दुर्गति से बच चुके हैं. अब संसद उनका बाल भी बांका नहीं कर सकता, क्योंकि ऐसा करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 217 और 1968 के अधिनियम में संशोधन करना होगा.
डेढ़ दशक पहले न्यायमूर्ति सौमित्र सेन का इस्तीफा देने के बाद संसद में न्यायाधीश को पद से हटाने को लेकर शुरू की गई भारी-भरकम प्रक्रिया के पंगु होने का सबसे बेहतरीन उदाहरण है. न्यायमूर्ति वर्मा ने तो जांच समिति की रिपोर्ट आने पर इस्तीफा दिया है, जबकि न्यायमूर्ति सेन ने तो उनके खिलाफ उच्च सदन में प्रस्ताव पारित होने के बाद इस्तीफा दिया था.
क्या कहता है संविधान, कानून और प्रक्रिया?
इसके बावजूद न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ प्रक्रिया आगे ले जाने की कवायद पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा कदम आगे बढ़ाए जाने के दावों के हवाई किले बनाए जा रहे हैं. जबकि संविधान, कानून और प्रक्रिया अब इसकी इजाजत नहीं देती, यानी की अब डोर हाथ से निकल चुकी है. चाहकर भी कुछ नहीं किया जा सकता और अगर करना है तो न्यायाधीश (जांच) अधिनियम-1968, अनुच्छेद 217 समेत कई अन्य महत्वपूर्ण संशोधन करने होंगे. अन्यथा इस्तीफा देकर पद से हट चुके न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ अब संसद कदम उठाने में सक्षम नहीं है। जबकि जांच समिति ने जस्टिस वर्मा के ऊपर लगे तीनों आरोपों को सिद्ध पाया है.
संविधानविदों का क्या है मानना?
संविधानविद कहते हैं कि न्यायाधीशों को प्रतिरक्षा प्रदान करने की कवायद यह नहीं कहती कि आपराधिक मामले में उनके खिलाफ एफआईआर या मुकदमा नहीं चलाया जा सकता. हालांकि भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) से मंजूरी का एक कदम संतुलन कायम करने के लिए जरूर रखा गया है, ताकि न्यायाधीशों को बेवजह कोई इस तरीके से फंसा नहीं सके.
न्यायमूर्ति वर्मा के मामले में पूर्व सीजेआई संजीव खन्ना की ओर से दस्तावेजों को सार्वजनिक किया गया. दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से प्राथमिक रिपोर्ट ली गई, लेकिन सवाल ये उठता है कि जब मामला आपराधिक श्रेणी का था तो एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई गई? खैर छोड़िए जो बीत गई सो बात गई तो अब क्या होगा, जवाब है कि अब कुछ नहीं होगा। उसके पीछे तीन महत्वपूर्ण कानूनी स्थितियां हैं जो न्यायमूर्ति वर्मा को संरक्षित करती हैं.
कहां फंस रहा पेंच?
पहली स्थिति ये है कि न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया न्यायाधीश (जांच) अधिनियम-1968 के मुताबिक चलती है. उच्च न्यायालयों या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के खिलाफ जांच रिपोर्ट आने के बाद संसद के दोनों सदनों से न्यायाधीशों को हटाने का प्रस्ताव पारित कराना होता है. विशेष बहुमत से पारित प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है. राष्ट्रपति उस न्यायाधीश को पद से हटाने के आदेश पर मंजूरी प्रदान करते हैं. यह प्रक्रिया अभी शेष है और न्यायमूर्ति वर्मा पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं. ऐसे में अगर प्रक्रिया आगे लायी जाती है तो पद से किसे हटाया जाएगा.
दूसरी स्थिति भी न्यायमूर्ति वर्मा के इस्तीफे से जुड़ी हुई है, जिन्होंने 9 अप्रैल 2026 को राष्ट्रपति को इस्तीफा भेजकर खुद को पद से हटाए जाने की दुर्दशा से संरक्षित कर लिया था. संविधान अनुच्छेद 217(1)(अ) कहता है कि हाईकोर्ट का न्यायाधीश अपने हस्ताक्षर से राष्ट्रपति को संबोधित लिखित पत्र द्वारा इस्तीफा दे सकता है.
संविधान इसमें राष्ट्रपति द्वारा इस्तीफे को स्वीकार करने की कोई शर्त नहीं लगाता. इसके मुताबिक अब न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने के लिए संसद में प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की जरूरत नहीं है. हालांकि इसकी न्यायिक समीक्षा के लिए सर्वोच्च अदालत का रुख लोकसभा अध्यक्ष की ओर से किया जा सकता था, लेकिन न्यायाधीशों के इस्तीफे के मामले में साढ़े चार दशक पुराना फैसला पहले से मौजूद है.
क्या है सुप्रीम कोर्ट का 1978 वाला फैसला?
तीसरी स्थिति न्यायमूर्ति वर्मा को संरक्षित करने के लिए संसद में उनके खिलाफ लंबित मौजूदा प्रक्रिया के लिए ताबूत की कील के समान है. दरअसल 1978 में सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार की याचिका पर एक फैसला दिया था. इसमें स्पष्ट किया था कि हाईकोर्ट न्यायाधीश का इस्तीफा राष्ट्रपति की औपचारिक स्वीकृति पर निर्भर नहीं है. राष्ट्रपति को इस्तीफा विधिवत संबोधित और संचारित होते ही यह एक प्रभावी, एकतरफा संवैधानिक कृत्य बन जाता है.
तीनों ही स्थितियों से यह साफ हो जाता है कि संसद में चल रही प्रक्रिया निष्प्रभावी हो चुकी है. हालांकि यह लोकसभा अध्यक्ष को तय करना होता है, जैसा कि न्यायमूर्ति सौमित्र सेन के मामले में हुआ था. अब सवाल ये है कि एक उदाहरण पहले से मौजूद है, ऐसे में क्या मौजूदा लोकसभा अध्यक्ष कोई नई मिसाल पेश करने की कोशिश करेंगे. यानी संशोधनों के जरिए खासतौर पर उन स्थितियों को स्पष्ट कर पाएंगे जो किसी न्यायाधीश के इस्तीफा देते ही इस पूरी प्रक्रिया को धराशायी कर देती है.
अब तक 6 जजों के खिलाफ महाभियोग
भारत में बोलचाल की भाषा में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को पद से हटाने की प्रक्रिया को भी महाभियोग कहा जाता है. यदि जजों के संदर्भ में बात करें तो भारतीय इतिहास में जजों के खिलाफ 6 से अधिक बार महाभियोग की कार्यवाही या प्रस्ताव शुरू किए गए हैं, लेकिन आज तक किसी भी जज को महाभियोग द्वारा पद से हटाया नहीं जा सका है या तो प्रस्ताव संसद में गिर गया या फिर जज ने कार्यवाही पूरी होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया.
जजों के खिलाफ चलाए गए प्रमुख मामलों
- जस्टिस वी. रामास्वामी (1993): स्वतंत्र भारत में महाभियोग का सामना करने वाले यह पहले न्यायाधीश (सुप्रीम कोर्ट) थे. इनके खिलाफ प्रस्ताव लोकसभा में आया, लेकिन कांग्रेस पार्टी द्वारा मतदान में भाग न लेने के कारण यह आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका और गिर गया.
- जस्टिस सौमित्र सेन (2011): कोलकाता हाई कोर्ट के इस जज के खिलाफ धन के दुरुपयोग के आरोप में राज्यसभा ने महाभियोग प्रस्ताव पास कर दिया था. लेकिन लोकसभा में इस पर वोटिंग होने से ठीक पहले ही उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.
- जस्टिस पी. डी. दिनाकरन (2011): सिक्किम हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार और जमीन कब्जाने के आरोप थे. संसद में महाभियोग की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया.
- जस्टिस जे. बी. पारदीवाला (2015): गुजरात हाई कोर्ट के जज के खिलाफ आरक्षण पर की गई टिप्पणी को लेकर महाभियोग का नोटिस दिया गया था, लेकिन उनके द्वारा टिप्पणी वापस लेने के बाद मामला आगे नहीं बढ़ा.
- जस्टिस एसके गंगेले (2015): मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर महाभियोग की कार्यवाही शुरू हुई थी, लेकिन जांच कमेटी में आरोप साबित नहीं हो सके.
- जस्टिस सी. वी. नागार्जुन रेड्डी (2016-2017): आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाई कोर्ट के जज के खिलाफ दो बार प्रस्ताव लाने का प्रयास हुआ, लेकिन पर्याप्त सांसदों के समर्थन के अभाव में यह खारिज हो गया.
- सीजेआई दीपक मिश्रा (2018): भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के खिलाफ विपक्ष द्वारा महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था, जिसे राज्यसभा के सभापति ने तकनीकी आधारों पर खारिज कर दिया था.
- जस्टिस यशवंत वर्मा (2025-2026): दिल्ली-इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आवास पर भारी मात्रा में जली हुई नकदी मिलने के बाद सांसदों ने महाभियोग (रिमूवल मोशन) की कार्यवाही शुरू की. हालांकि उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन संसदीय समिति ने जांच में आरोपों को सही पाया है.

पीयूष पांडे
प्रमुखत: सुप्रीम कोर्ट, वित्त मंत्रालय और भारतीय निर्वाचन आयोग की खबरों की जिम्मेदारी. पत्रकारिता में 22 वर्षों से ज्यादा का अनुभव. हिंदुस्तान, अमर उजाला, दैनिक भास्कर और आज में सेवाएं दीं. खबरिया चैनल और अखबार के अलावा दैनिक भास्कर के डिजिटल प्लेटफॉर्म में जिम्मेदारी निभाई, जबकि ऑल इंडिया रेडियो के आमंत्रण पर कई विशिष्ट जनों के साक्षात्कार किए.
Read More