दिल्ली में कार्गो वॉल्यूम हुआ दोगुना, नो री-स्क्रीनिंग से एयर कार्गो ट्रांसशिपमेंट में बड़ा बदलाव

दिल्ली में कार्गो वॉल्यूम हुआ दोगुना, नो री-स्क्रीनिंग से एयर कार्गो ट्रांसशिपमेंट में बड़ा बदलाव

नई व्यवस्था के तहत यदि कार्गो सुरक्षित और सीलबंद यूनिट लोड डिवाइस (ULD) यानी एयरलाइन कंटेनर में आता है, तो दिल्ली एयरपोर्ट पर उसे खोलकर प्रत्येक पैकेट की दोबारा जांच करने की जरूरत नहीं होगी.

नई व्यवस्था के तहत यदि कार्गो सुरक्षित और सीलबंद यूनिट लोड डिवाइस (ULD) यानी एयरलाइन कंटेनर में आता है, तो दिल्ली एयरपोर्ट पर उसे खोलकर प्रत्येक पैकेट की दोबारा जांच करने की जरूरत नहीं होगी.

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Cargo volume doubles in Delhi due to no re-screening policy drives major shift in air cargo transshipment

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भारत को दुनिया के प्रमुख लॉजिस्टिक्स और ट्रांसशिपमेंट हब के रूप में विकसित करने की दिशा में केंद्र सरकार की नई एयर कार्गो नीति के शुरुआती परिणाम उत्साहजनक सामने आए हैं. नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो (BCAS) की ओर से शुरू किए गए ‘नो री-स्क्रीनिंग’ एयर कार्गो ट्रांसशिपमेंट के 90 दिवसीय पायलट प्रोजेक्ट ने दिल्ली एयरपोर्ट पर कार्गो परिवहन की गति और क्षमता में बड़ा सुधार दिखाया है.

इस व्यवस्था का उद्देश्य घरेलू शहरों से आने वाले अंतरराष्ट्रीय कार्गो को देश के किसी बड़े एयरपोर्ट पर ट्रांजिट के दौरान दोबारा खोलकर जांचने की जरूरत को खत्म करना है. फिलहाल इसका परीक्षण चेन्नई-दिल्ली-फ्रैंकफर्ट रूट पर किया जा रहा है. 20 जून से शुरू हुए इस पायलट प्रोजेक्ट को फिलहाल एयर इंडिया संचालित कर रही है.

कार्गो वॉल्यूम हुआ दोगुने से ज्यादा

पायलट प्रोजेक्ट के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, चेन्नई-दिल्ली-फ्रैंकफर्ट मार्ग पर रोजाना कार्गो वॉल्यूम 2.2 टन से बढ़कर 4.5 टन तक पहुंच गया है. यानी इस मार्ग पर एयर कार्गो की आवाजाही दोगुने से भी ज्यादा हो गई है. इसके साथ ही ट्रांजिट टाइम में भी भारी कमी आई है. पहले दिल्ली एयरपोर्ट पर कनेक्टिंग फ्लाइट के लिए कार्गो को करीब 36 से 48 घंटे तक रोके रखना पड़ता था. नई व्यवस्था के बाद यह समय घटकर महज 5 से 8 घंटे रह गया है. इससे ट्रांजिट टाइम में करीब 80 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है.

सीलबंद कंटेनर में सीधे अंतरराष्ट्रीय उड़ान

नई व्यवस्था के तहत यदि कार्गो सुरक्षित और सीलबंद यूनिट लोड डिवाइस (ULD) यानी एयरलाइन कंटेनर में आता है, तो दिल्ली एयरपोर्ट पर उसे खोलकर प्रत्येक पैकेट की दोबारा जांच करने की जरूरत नहीं होगी. निर्धारित सुरक्षा और सीलिंग प्रोटोकॉल का पालन होने पर कार्गो को सीधे अंतरराष्ट्रीय उड़ान में ट्रांसफर किया जा सकता है. पहले घरेलू शहरों से विदेश भेजे जाने वाले माल को दिल्ली जैसे एयरपोर्ट पर कनेक्टिंग फ्लाइट में शिफ्ट करने से पहले दोबारा खोलकर जांचना पड़ता था. इस प्रक्रिया में समय अधिक लगता था और माल के खराब होने, नुकसान या चोरी का जोखिम भी रहता था.

इसी वजह से कई भारतीय निर्यातक अपना माल दुबई और दोहा जैसे अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट हब के जरिए भेजना पसंद करते थे. नई व्यवस्था से भारत के अपने एयरपोर्ट्स को वैश्विक कार्गो नेटवर्क में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की उम्मीद है.

अन्य शहरों तक बढ़ेगा सिस्टम

शुरुआती सफलता के बाद अब इस व्यवस्था का विस्तार अहमदाबाद, बेंगलुरु, हैदराबाद और मुंबई से आने वाले कार्गो तक किया जा रहा है. इन शहरों से दिल्ली के रास्ते कार्गो को कोपेनहेगन, फ्रैंकफर्ट और लंदन हीथ्रो जैसे अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों तक भेजने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा रहा है.

दिल्ली एयरपोर्ट बनेगा बड़ा ट्रांसशिपमेंट हब

विमानन क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, नई व्यवस्था भारत की लॉजिस्टिक्स क्षमता को मजबूत कर सकती है. दिल्ली एयरपोर्ट के पास 95 से अधिक अंतरराष्ट्रीय कार्गो कॉरिडोर के जरिए सालाना करीब 20 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त ट्रांसशिपमेंट संभालने की क्षमता बताई जा रही है. इससे निर्यातकों को समय और लागत दोनों में फायदा मिल सकता है. साथ ही भारत को विदेशी ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी. सरकार इस नीति को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की योजना पर काम कर रही है. इसके तहत घरेलू से अंतरराष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय कार्गो ट्रांसशिपमेंट को शामिल किया जाना है.

सुरक्षा व्यवस्था सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि शुरुआती परिणाम काफी सकारात्मक हैं, लेकिन देशभर में इस व्यवस्था को लागू करना आसान नहीं होगा. अलग-अलग एयरपोर्ट्स पर आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर, सीलबंद कंटेनर की निगरानी, ट्रैकिंग सिस्टम और सुरक्षा प्रोटोकॉल को मजबूत बनाए रखना जरूरी होगा. सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि कार्गो ट्रांजिट में तेजी के साथ सुरक्षा मानकों से कोई समझौता न हो. यदि देश के अन्य प्रमुख एयरपोर्ट्स पर भी यही मॉडल सफल रहता है, तो भारत वैश्विक एयर कार्गो और ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है.

कुल मिलाकर, ‘नो री-स्क्रीनिंग’ व्यवस्था भारत के एयर कार्गो क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकती है. इससे न केवल माल की आवाजाही तेज होगी, बल्कि भारतीय निर्यातकों के लिए विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब पर निर्भरता घटाने और भारत को एक प्रमुख वैश्विक लॉजिस्टिक्स हब बनाने की दिशा में भी मदद मिलेगी.