गर्म पहाड़ लाएंगे तबाही, नेपाल की बाढ़ ने खोला हिमालय का खतरनाक राज; भारत पर कैसा खतरा?

नेपाल की विनाशकारी बाढ़ ने हिमालय में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। गर्म होते हिमालय, पिघलते ग्लेशियर और GLOF का खतरा भारत के चमोली और सिक्किम जैसे पुराने हादसों की याद दिला रहा है।

नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ सैकड़ों लोगों की जान नहीं ली है, बल्कि हिमालय में तेजी से बढ़ते एक बड़े खतरे की ओर ध्यान खींचा है- क्या बदलते मौसम और पिघलते ग्लेशियरों के बीच हिमालय में बन रहे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट अब पहले जितने सुरक्षित हैं?

नेपाल की ताजा त्रासदी इसका गंभीर उदाहरण है। बाढ़ और मलबे ने रासुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों में कई पनबिजली परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया। देश की करीब 10 फीसदी बिजली उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई है। कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में सैकड़ों कर्मचारी फंसे या लापता बताए जा रहे हैं।

लेकिन असली चिंता इससे आगे की है। क्योंकि जिस हिमालय में नेपाल की बिजली व्यवस्था टिकी है, उसी पर्वतीय क्षेत्र का बड़ा हिस्सा भारत की नदियों और पनबिजली परियोजनाओं का भी आधार है।

हिमालय गर्म हो रहा है, खतरा क्यों बढ़ रहा?

हिमालय को लंबे समय तक बर्फ और पानी का विशाल भंडार माना जाता रहा। लेकिन अब इस व्यवस्था में तेजी से बदलाव हो रहा है। ICIMOD की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार 2000 के बाद दोगुनी हो गई है। 1975 के बाद कई ग्लेशियरों की मोटाई में 27 मीटर तक की कमी दर्ज की गई है।

इसका मतलब सिर्फ इतना नहीं है कि भविष्य में पानी कम हो जाएगा। फिलहाल तेजी से पिघलती बर्फ और अस्थिर होती पहाड़ी ढलानें फ्लैश फ्लड, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF, भूस्खलन और मलबे के सैलाब का खतरा बढ़ा रही हैं।

यही वजह है कि हिमालय में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट के लिए खतरा दोतरफा हो गया है। एक तरफ अचानक बहुत ज्यादा पानी आ सकता है और दूसरी तरफ लंबे समय में नदी के प्रवाह का पैटर्न बदल सकता है। ICIMOD के मुताबिक, हिंदूकुश हिमालय में मौजूद और प्रस्तावित करीब दो-तिहाई हाइड्रोपावर परियोजनाएं संभावित ग्लेशियल बाढ़ की चपेट में आ सकती हैं।

नेपाल में अभी क्या हुआ?

नेपाल की समस्या इसलिए भी गंभीर है क्योंकि वहां बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा पहाड़ी नदियों पर आधारित रन-ऑफ-द-रिवर हाइड्रोपावर से आता है। ऐसी परियोजनाएं आमतौर पर तेज बहाव वाली संकरी नदी घाटियों में बनाई जाती हैं। लेकिन यही घाटियां अब जोखिम का केंद्र बन रही हैं।

ताजा बाढ़ में सड़कें, पुल और बिजली परियोजनाएं एक साथ क्षतिग्रस्त हुईं। इसका मतलब यह है कि किसी पावर प्लांट को नुकसान होने के साथ-साथ वहां पहुंचने का रास्ता और बिजली बाहर ले जाने वाली ट्रांसमिशन लाइन भी टूट सकती है। यानी एक घटना का असर पूरे इलाके की बिजली व्यवस्था पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में सिर्फ टूटी हुई परियोजना को उसी जगह दोबारा बना देना पर्याप्त नहीं होगा। यह देखना होगा कि वह परियोजना वहां बनी ही क्यों थी और अगली बार उससे बड़ा सैलाब आया तो क्या होगा।

भारत के लिए नेपाल की बाढ़ क्यों है बड़ी चेतावनी?

भारत के हिमालयी राज्यों- उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में भी बड़ी संख्या में हाइड्रोपावर परियोजनाएं नदियों के ऊपरी और संकरे हिस्सों में बनी हैं। भारत को इसका खामियाजा पहले भी भुगतना पड़ा है।

फरवरी 2021 में उत्तराखंड के चमोली में ग्लेशियर/बर्फ-चट्टान से जुड़ी घटना के बाद अचानक आई बाढ़ ने 13.2 मेगावाट का ऋषिगंगा हाइड्रो प्रोजेक्ट पूरी तरह बहा दिया था। NTPC के 520 मेगावाट के तपोवन-विष्णुगाड प्रोजेक्ट को भी भारी नुकसान हुआ। सरकारी जांच के अनुसार घटना की शुरुआत करीब 400×700×150 मीटर आकार के बर्फ-चट्टान मलबे के हिमस्खलन से हुई थी।

फिर अक्टूबर 2023 में सिक्किम में साउथ ल्होनाक ग्लेशियल झील फटने से तीस्ता नदी में भयंकर बाढ़ आई। इस घटना में तीस्ता-III बांध का बड़ा हिस्सा कुछ ही मिनटों में बह गया, जबकि तीस्ता-V समेत दूसरी परियोजनाओं को भी नुकसान पहुंचा।

इस घटना के बाद भारत सरकार को हाइड्रोपावर परियोजनाओं की डिजाइन व्यवस्था पर दोबारा विचार करना पड़ा। केंद्रीय जल आयोग ने GLOF के खतरे वाली मौजूदा और निर्माणाधीन परियोजनाओं के डिजाइन फ्लड की समीक्षा शुरू की और नई परियोजनाओं के लिए GLOF अध्ययन को जरूरी बनाया। CWC जून से अक्टूबर के बीच 902 ग्लेशियल झीलों और जल निकायों की निगरानी भी करता है।

खतरा सिर्फ बांध टूटने का नहीं है

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हिमालय में एक आपदा अकेली नहीं आती। ग्लेशियर टूट सकता है, उसके बाद बाढ़ आ सकती है, बाढ़ से भूस्खलन हो सकता है और मलबा सड़क-पुल-टनल को बंद कर सकता है। फिर बिजलीघर तक राहत या मरम्मत दल पहुंचना मुश्किल हो सकता है।

यानी भविष्य की योजना में सिर्फ बांध की मजबूती देखना काफी नहीं है। पूरी घाटी को एक सिस्टम की तरह देखना होगा। कहां प्लांट बनेगा, नदी का रास्ता कितना सुरक्षित है, ऊपर कितनी ग्लेशियल झीलें हैं, ढलान कितनी अस्थिर है, वैकल्पिक सड़क कहां होगी और बिजली की बैकअप व्यवस्था क्या होगी- इन सभी सवालों का जवाब परियोजना बनने से पहले चाहिए।

क्या हिमालय में हाइड्रोपावर बंद कर देना चाहिए?

शायद नहीं। भारत और नेपाल दोनों के लिए हाइड्रोपावर महत्वपूर्ण है। यह बिजली के साथ-साथ आर्थिक विकास और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण का अहम हिस्सा है। लेकिन अब सवाल ‘कितनी बिजली बना सकते हैं?’ से बदलकर ‘कितनी सुरक्षित और टिकाऊ बिजली बना सकते हैं?’ होना चाहिए। नेपाल की मौजूदा त्रासदी और भारत के चमोली तथा सिक्किम के अनुभव एक ही बात बताते हैं- हिमालय में मौसम बदल चुका है, इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर की डिजाइन और सोच भी बदलनी होगी।

आने वाले समय में बेहतर अर्ली वार्निंग सिस्टम, ग्लेशियर और ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी, मल्टी-हैजर्ड रिस्क असेसमेंट, सुरक्षित लोकेशन, वैकल्पिक बिजली स्रोत और विकेंद्रीकृत सोलर जैसी व्यवस्थाएं जरूरी हो सकती हैं। ICIMOD भी हिमालय में आपदाओं को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ जुड़े मल्टी-हैजर्ड जोखिम के रूप में देखने की जरूरत बता चुका है। नेपाल की बाढ़ इसलिए सिर्फ नेपाल की कहानी नहीं है। यह भारत के हिमालय के लिए भी एक चेतावनी है- अगली बार सवाल यह नहीं होना चाहिए कि बांध कितना बड़ा है, बल्कि यह कि बदलते हिमालय के सामने वह कितना तैयार है।