कैसे मिलेगा बच्चों को पोषण: रसोई देखिए... उसमें बनने वाला खाना देखिए - Indore News

कैसे मिलेगा बच्चों को पोषण:रसोई देखिए... उसमें बनने वाला खाना देखिए

इंदौर34 मिनट पहलेलेखक: संजय रजक

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मक्खियों से भरे आटे की पूड़ियां... महीनों से बिना साफ हुए किचन... कच्ची और जली रोटियां, दाल के नाम पर पीला पानी, दिखावे के दूध की खीर। यह है आंगनवाड़ियों में 20 करोड़ के पोषण आहार की हकीकत। दैनिक भास्कर ने इंदौर जिले की 35 आंगनवाड़ियों में पड़ताल की तो गंभीर लापरवाही सामने आई और निगरानी व्यवस्था की पोल खुल गई।

इंदौर जिले की 1839 आंगनवाड़ियों में 3 से 6 वर्ष के 86 हजार 157 बच्चों को रोज नाश्ता और ताजा भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी 705 स्वयं सहायता समूहों पर है। हर समूह औसतन 12 आंगनवाड़ियों में भोजन पहुंचाता है। सरकार इस व्यवस्था पर हर साल करीब 20 करोड़ रुपए खर्च करती है।

कहीं मेन्यू के अनुसार आइटम नहीं, कहीं समय पर खाना नहीं

राजपुरा : गंदगी के बीच बन रही थीं पूड़ियां दोपहर 1 बजे तक बच्चों को भोजन नहीं मिला था। यहां दुर्गा स्वयं सहायता समूह भोजन बनाता है। जिस रसोई में खाना तैयार हो रहा था, वहां चारों ओर गंदगी थी। जिस आटे से पूड़ियां बनाई जा रही थी उसपर मक्खियां बैठी थीं। बिहाड़िया पहाड़घाटी : तय मेन्यू में पुलाव था। बच्चों को साधारण चावल के साथ कढ़ी परोसी गई।

उमठ : दो दिन से बच्चों को भोजन नहीं मिला

उमठ आंगनवाड़ी में लगातार दो दिन से न नाश्ता मिला, न भोजन। संगम स्वयं सहायता समूह ने 1 किमी दायरा होने के बाद भी दूरी का बहाना बनाकर भोजन पहुंचाना बंद कर दिया। जिस रसोई में भोजन तैयार हो रहा था, वहां गंदगी थी। कई दिनों से झाड़ू तक नहीं लगी थी। आंगनवाड़ी भवन में बिजली और शौचालय भी नहीं है।

बेका : दोपहर तक भोजन तैयार नहीं हुआ बेका गांव की आंगनवाड़ी में दोपहर 12:30 बजे तक बच्चों का भोजन तैयार नहीं हुआ था। जिस स्थान पर भोजन बनाया जा रहा था, वहां भी साफ-सफाई नहीं थी। बिहाड़िया : 11 बजे तक होता रहा नाश्ते का इंतजार यहां मेन्यू में सुबह नमकीन दलिया और दोपहर में पुलाव था। सुबह 11 बजे तक न नाश्ता मिला, न भोजन।

रसकुंडिया : बच्चे आए पर आंगनवाड़ी पर ताला घने जंगलों में बसे रसकुंडिया गांव में आंगनवाड़ी बंद मिली। काफी बच्चे केंद्र पर पहुंचे, लेकिन ताला लगा होने के कारण वापस लौट गए। ग्रामीणों ने बताया कि यहां कई बार कर्मचारी ही नहीं आते। नाश्ता-भोजन भी नियमित नहीं पहुंचता। कई बार तो गांव के लोग ही बच्चों को भोजन कराते हैं। यहां कोई देखने वाला ही नहीं है।

8 रुपए खर्च करती है सरकार हर बच्चे पर सरकार समूहों को गेहूं और चावल उपलब्ध कराती है। एक बच्चे के नाश्ते और भोजन पर रोज 8 रुपए खर्च करती है। इस राशि में तेल, मसाले, सब्जियां, दूध, ईंधन, परिवहन का खर्च शामिल है। बाजार में 100 मिलीग्राम दूध की कीमत 6 से 8 रुपए है। दाल करीब 140 रुपए प्रति किलो है। तेल 140 से 180 रुपए प्रति लीटर है। ऐसे में सिर्फ 8 रुपए में बच्चों को पोषक भोजन कैसे दिया जा सकता है?

ऐप पर रोज दर्ज होती है उपस्थित बच्चों की संख्या भोजन सप्लाई और भुगतान पोषण ट्रैकर ऐप से जुड़ा है। रोज स्वयं सहायता समूह और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता उपस्थित बच्चों की संख्या और भोजन वितरण की जानकारी इस ऐप पर दर्ज करते हैं। विभाग उसी संख्या के आधार पर समूहों को भुगतान करता है।

इस पर कल बात करते हैं

अभी मैं कुछ कह नहीं सकता। इस बारे में कल बात करते हैं। -रजनीश सिन्हा, जिला कार्यक्रम अधिकारी, महिला एवं बाल विकास

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