अब दूनवासियों को मिलेगी और साफ हवा, ड्रोन और मशीनी सफाई ने दिखाया कमाल - Doon Horizon
राष्ट्रीय स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026 में देहरादून ने सात पायदान की शानदार छलांग के साथ 12वां स्थान हासिल किया है। हालांकि, तीन लाख से कम आबादी वाले वर्ग में ऋषिकेश और काशीपुर रैंकिंग में पिछड़ गए हैं।
दून हॉराइज़न, देहरादून (9 सितंबर): लगातार बढ़ते ट्रैफिक और निर्माण कार्यों की धूल के बीच दूनवासियों के लिए एक सुकून भरी खबर है। शहर की हवा अब पहले से कहीं ज्यादा साफ हो गई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की ओर से जारी हालिया रैंकिंग में देहरादून ने जबरदस्त वापसी करते हुए लंबी छलांग मारी है।
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दरअसल, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (National Clean Air Programme) के नए सर्वेक्षण में तीन से दस लाख की आबादी वाले शहरों के स्लैब में दून 182 अंकों के साथ 12वें पायदान पर पहुंच गया है। बीते साल 2025 में शहर 19वें नंबर पर संघर्ष कर रहा था। यानी सीधे सात स्थानों का सुधार। यह बदलाव रातों-रात नहीं आया है।
कैसे सुधरी दून की सांसें?
साल 2019 में केंद्र सरकार ने देश के 131 ‘नॉन-अटेनमेंट’ शहरों (जहां प्रदूषण तय मानकों से अधिक था) के लिए एनसीएपी लागू किया था। इसमें 2026 तक पीएम कणों को 40% तक घटाने का लक्ष्य रखा गया था। देहरादून इस टारगेट की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। शहर में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नगर निगम और एमडीडीए की संयुक्त रणनीति ने यहां गेम चेंजर का काम किया है।
धूल को उड़ने से रोकने के लिए ड्रोन तकनीक से पानी की बौछार की गई और सड़कों पर मैकेनिकल स्वीपिंग मशीनें उतारी गईं। नगर आयुक्त आलोक कुमार पांडेय के मुताबिक, “संबंधित विभागों के समन्वय से अगले साल और बेहतर रैंक लाएंगे।” इसके अलावा कच्ची सड़कों को पक्का करने और बायोमास (कूड़ा-पत्तियां) जलाने वालों पर हुए धड़ाधड़ चालान ने हवा में जहर घुलने से रोका। नतीजतन, 2019-20 में जो पीएम-2.5 का स्तर 93.04 हुआ करता था, वह 2025-26 में घटकर 72.25 रह गया है।
धोरण वार्ड बना पूरे प्रदेश के लिए नजीर
राजधानी का धोरण वार्ड प्रदूषण नियंत्रण के मामले में अव्वल साबित हुआ है। यहां सिर्फ कागजी चालान नहीं कटे, बल्कि जमीनी बुनियादी ढांचे पर काम हुआ। वार्ड में एक नया मैकेनाइज्ड कूड़ा ट्रांसफर स्टेशन स्थापित किया गया है। साथ ही एमडीडीए ने बड़े पैमाने पर हरियाली बढ़ाई और सड़क किनारे इंटरलॉकिंग टाइल्स बिछाईं, जिससे धूल का उड़ना लगभग बंद हो गया है।
ऋषिकेश और काशीपुर का गणित क्यों बिगड़ा?
एक तरफ राजधानी चमकी, तो दूसरी तरफ तीन लाख से कम आबादी वाले वर्ग में ऋषिकेश और काशीपुर पिछड़ गए हैं। काशीपुर का मामला बेहद दिलचस्प है। यहां 2019 से अब तक वायु गुणवत्ता (Air Quality) के प्रमुख मानक पीएम-2.5 के स्तर में 77.04 प्रतिशत की रिकॉर्ड कमी आई है। इसके बावजूद शहर 18वें से गिरकर 21वें स्थान पर पहुंच गया।
आंकड़ों की गहराई में जाएं तो इसकी असली वजह अन्य शहरों का अधिक आक्रामक प्रदर्शन और एनसीएपी के दूसरे कड़े मानकों (जैसे- ठोस कचरा और निर्माण सामग्री अपशिष्ट प्रबंधन) में काशीपुर का धीमा काम है। वहीं, योग नगरी ऋषिकेश में पिछले साल पीएम-2.5 का स्तर 50.49 था, जो इस बार बढ़कर 61.16 हो गया। इसी कारण शहर 14वें से खिसककर 16वें नंबर पर आ गया।
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पीसीबी के सदस्य सचिव डॉ. पराग मधुकर धकाते ने स्पष्ट किया कि तीनों ही शहरों में वायु प्रदूषण की बहुत सख्त मॉनिटरिंग की जा रही है। एनसीएपी रैंकिंग केवल हवा के कणों पर निर्भर नहीं होती, इसमें औद्योगिक उत्सर्जन और वाहनों के धुएं पर लगाम जैसे आठ अलग-अलग मानकों पर शहरों को परखा जाता है। देहरादून ने सभी मोर्चों पर संतुलित काम किया है, जबकि बाकी शहरों को अभी अपनी रफ्तार बढ़ानी होगी।