एक देश एक चुनाव पर क्या सोचता है भारत का युवा? कहां चाहते हैं सुधार

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एक देश एक चुनाव पर क्या सोचता है भारत का युवा? कहां चाहते हैं सुधार

एक देश एक चुनाव (One Nation One Election) पर क्या सोचते हैं देश के युवा, क्या है उनकी राय? देखिए हमारे इस खास एपिसोड में...!

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एक देश एक चुनाव पर क्या साचता है भारत का युवा

सोचिए, अगर भारत में लोकसभा, विधानसभा और तमाम स्थानीय चुनाव एक साथ होने लगें, तो क्या होगा? यह सिर्फ एक बदलाव नहीं, बल्कि हमारे चुनावी इतिहास का सबसे ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। वर्तमान व्यवस्था में हर कुछ महीनों में होने वाले पारंपरिक चुनावों पर पानी की तरह पैसा बहता है। संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की रिपोर्ट के अनुसार अगर एक देश एक चुनाव (One Nation One Election) की नीति लागू होती है, तो देश के करीब 7 लाख करोड़ रुपये बच सकते हैं। इतना ही नहीं, इस ऐतिहासिक कदम से भारत की जीडीपी (GDP) ग्रोथ में भी 1.6% तक का बड़ा उछाल आ सकता है!

क्या कहते हैं युवा?

देश के विकास, पैसे की बचत और भविष्य की इस नई तस्वीर पर क्या है आज के युवाओं की राय? 'मेरा युवा भारत' (MY Bharat) के ऊर्जावान वालंटियर्स इसको किस नजरिए से देखते हैं? जानने के लिए देखिए हमारा यह खास एपिसोड...

क्यों जरूरी है एक देश एक चुनाव?

वॉलंटियर्स का मानना है कि बार-बार होने वाले चुनावों से देश के संसाधनों और धन की भारी बर्बादी होती है। युवाओं ने इसे 'विकसित भारत 2047' के सपने को साकार करने की दिशा में एक आवश्यक कदम बताया है। वॉलंटियर प्रीति कालरा बताती हैं कि यह कोई ऐसा नहीं है जो भारत ने पहले नहीं किया है। 1952 से लेकर 1967 तक चार बार वन नेशन वन इलेक्शन हुआ है। तो, यह चीज अब दोबारा आनी जरूरी है। एक अन्य युवा मृत्युंजय एक देश एक चुनाव को लेकर कहते हैं कि आज पूरे साल कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। देश का संसाधन बर्बाद हो रहा है। इसे रोका जाना चाहिए।

बार-बार चुनाव से देश को नुकसान

चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि वर्तमान में देश हमेशा 'चुनावी मोड' में रहता है, जिससे 'मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट' बार-बार लागू होता है। इस कारण सरकारी कामकाज और विकास परियोजनाएं ठप हो जाती हैं । वॉलंटियर्स ने साझा किया कि चुनाव ड्यूटी के कारण स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई का नुकसान होता है, जो छात्रों के भविष्य के लिए चिंता का विषय है। हरियाणा की शिखा कहती हैं कि चुनाव के कारण आज भारत जो है वह एक ऐसे स्कूल की तरह बन चुका है कि जिसमें हर महीने एग्जाम्स कंडक्ट हो रहे हैं और वहां पर टीचर्स जो हैं एग्जाम कंडक्ट करने की तैयारी में लगे हुए हैं। स्टूडेंट्स जो हैं वो लर्निंग की अलावा एग्जाम्स की प्रिपरेशन में लगे हुए हैं। ये जो इलेक्शंस हैं ये बिल्कुल उसी एग्जाम की तरह हो चुके हैं। और इसी में हमारा जो एडमिनिस्ट्रेशन है वो व्यस्त रहता है। जबकि हमारे जो एडमिनिस्ट्रेशन है उसको डेवलपमेंट मोड में रहना चाहिए। अगर हमें विकसित भारत 2047 का सपना पूरा करना है तो हमें डेवलपमेंट पे ध्यान देना होगा और ये जो इलेक्शन मोड को खत्म करना होगा।

कहां होना चाहिए सुधार?

युवाओं ने तर्क दिया कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' को केवल राजनीतिक नजरिए से नहीं, बल्कि नीतिगत सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए। यह फ्रीबी कल्चर और चुनावों के दौरान होने वाले अनैतिक खर्चों व नशीले पदार्थों के इस्तेमाल पर लगाम लगाने में भी मददगार हो सकता है । हालांकि, विपक्ष की चिंताओं और आम सहमति बनाने की आवश्यकता पर भी चर्चा की गई। वॉलंटियर्स का मानना है कि सरकार को इस पर खुला मंच तैयार करना चाहिए और नागरिकों व विपक्षी दलों को विश्वास में लेना चाहिए।

युवाओं की भूमिका और जागरूकता

युवाओं का कहना है कि वे अपने क्षेत्रों में जाकर लोगों को इसके फायदे और मतदान प्रक्रिया के बारे में शिक्षित कर सकते हैं ताकि भ्रम की स्थिति दूर हो। इस दौरान युवाओं ने उड़ीसा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों का उदाहरण दिया गया, जहां एक साथ चुनाव होने के बावजूद मतदाताओं ने अपनी समझदारी का परिचय देते हुए केंद्र और राज्य के लिए अलग-अलग पार्टियों को चुना, जो यह साबित करता है कि भारतीय मतदाता जागरूक हैं।

कुल मिलाकर, चर्चा का सार यह रहा कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' न केवल प्रशासनिक दक्षता बढ़ाएगा बल्कि राष्ट्र के संसाधनों को सही दिशा में मोड़ने का काम करेगा। युवाओं ने 'संगच्छध्वम' (साथ मिलकर चलना) के मंत्र के साथ देश के विकास में इस सुधार के महत्व को रेखांकित किया।