मणिपुर में मिली हरे प्याज की नई किस्म ‘चिरू मारोई’, वैज्ञानिकों ने की पहचान

15 सितंबर 2026, नई दिल्ली: मणिपुर में मिली हरे प्याज की नई किस्म ‘चिरू मारोई’, वैज्ञानिकों ने की पहचान – उत्तर-पूर्व भारत के मणिपुर में हरे प्याज की एक अनोखी नई किस्म की पहचान की गई है। वैज्ञानिकों ने इसका नाम Allium fistulosum var. chirumaroi रखा है। स्थानीय स्तर पर इसे ‘चिरू मारोई (Chiru Maroi)’ के नाम से जाना जाता है। यह प्याज मणिपुर के बुंगते चिरू और नुंगशाई चिरू गांवों में स्थानीय आदिवासी समुदायों द्वारा उगाया जाता है।
वैज्ञानिक अध्ययन में इसे सामान्य हरे प्याज Allium fistulosum var. fistulosum से अलग पाया गया है। इसका पौधा अपेक्षाकृत छोटा होता है। इसके बल्ब की बाहरी झिल्ली भूरे-पीले रंग की होती है, जबकि इसके फूलों के गुच्छे (umbels) छोटे और गोलाकार होते हैं। इसके फूल भी निष्फल पाए गए हैं।
इन खासियतों से अलग है चिरू मारोई
‘चिरू मारोई’ का पौधा सामान्य हरे प्याज की तुलना में छोटा होता है। इसके बल्ब की बाहरी झिल्ली भूरे-पीले रंग की होती है। इसके पुष्पक्रम छोटे और गोलाकार होते हैं, जबकि इसके फूल बांझ पाए गए हैं। वैज्ञानिकों ने इसकी अलग पहचान की पुष्टि के लिए रूपात्मक तुलना, कोशिकीय विश्लेषण और आणविक वंशावली विश्लेषण किया। इसके गुणसूत्रों की संख्या 2n = 16 पाई गई। वहीं ITS और rbcL DNA बारकोडिंग से किए गए आणविक विश्लेषण में सामने आया कि यह अन्य हरे प्याज की किस्मों से करीबी रूप से जुड़ी है, लेकिन इसकी एक अलग और स्थिर वंशावली है।
स्थानीय खान-पान का महत्वपूर्ण हिस्सा
‘चिरू मारोई’ का प्रसार वनस्पति प्रवर्धन के जरिए होता है। यह स्थानीय जनजातीय समुदायों के खान-पान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका इस्तेमाल ताजा रूप में किया जाता है। इसके अलावा इसे पारंपरिक व्यंजनों और हर्बल उपचारों में भी उपयोग किया जाता है। हालांकि, इस किस्म का भौगोलिक क्षेत्र सीमित है। व्यावसायिक प्याज की किस्मों के बढ़ते प्रसार से इसके सामने संरक्षण की चुनौती भी है। ऐसे में ‘चिरू मारोई’ का संरक्षण महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विलुप्त होने का खतरा
वैज्ञानिकों ने इस स्थानीय किस्म के संरक्षण की जरूरत पर भी जोर दिया है। इसका भौगोलिक क्षेत्र काफी सीमित है और व्यावसायिक प्याज की किस्मों के बढ़ते प्रसार से चिरू मारोई के सामने खतरा पैदा हो रहा है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस किस्म की औपचारिक पहचान से Allium की आनुवंशिक विविधता को समझने में मदद मिलेगी। साथ ही, यह खोज स्थानीय समुदायों से जुड़ी उन पारंपरिक और कम इस्तेमाल होने वाली फसलों के संरक्षण के महत्व को भी सामने लाती है।
यह अध्ययन 2026 में Phytotaxa में प्रकाशित हुआ है। शोधपत्र के लेखक Khar, Anal, Pandey, Malav, Verma, Rajkumar और Zimik हैं। इसका शीर्षक “A new potential variety of bunching onion (Allium fistulosum L.) from North-East India” है।
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