नई दिल्ली घोषणा ने दुनिया को दिशा तो दिखाई है, लेकिन क्या ब्रिक्स उस दिशा में चल भी पाएगा? - प्रवक्ता.कॉम - Pravakta.Com
डॉ. मनोज कुमार जैन
पूर्व सहायक प्राध्यापक, राजनीति विज्ञान
नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का समापन ऐसे समय में हुआ है, जब दुनिया एक गहरे राजनीतिक और आर्थिक संक्रमण से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त नहीं हुआ है, पश्चिम एशिया लगातार अस्थिर है, अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, व्यापारिक प्रतिबंध और शुल्क वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी नई तकनीकें आने वाले समय की शक्ति-संरचना को बदलने की तैयारी में हैं। ऐसे दौर में भारत की मेजबानी में हुआ ब्रिक्स सम्मेलन महज राष्ट्राध्यक्षों की बैठक नहीं था। यह उस बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी जगह तलाश रहे देशों का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मंच भी था।
नई दिल्ली घोषणा ने बहुपक्षीयता, वैश्विक दक्षिण की आवाज, वैश्विक संस्थाओं में सुधार, आर्थिक सहयोग, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा आतंकवाद जैसे अनेक मुद्दों पर दिशा तय करने की कोशिश की है। लेकिन किसी भी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की असली परीक्षा उसके घोषणापत्र में नहीं, बल्कि उसके बाद शुरू होने वाले काम में होती है। इसलिए अब सबसे बड़ा सवाल यही है—नई दिल्ली ने दिशा तो दिखा दी, लेकिन क्या ब्रिक्स उस दिशा में चल भी पाएगा?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिक्स अब वह पुराना पांच देशों वाला समूह नहीं है, जिसकी कल्पना दो दशक पहले की गई थी। विस्तार के बाद इसमें अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक प्राथमिकताओं और रणनीतिक हितों वाले देश शामिल हैं। इन देशों को एक मंच पर लाना निश्चित रूप से इसकी ताकत है, लेकिन इन्हीं देशों के बीच मौजूद मतभेद इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकते हैं।
ब्रिक्स को यदि वास्तव में वैश्विक दक्षिण की आवाज बनना है तो उसे केवल पश्चिमी व्यवस्था की आलोचना करने से आगे जाना होगा। दुनिया को यह बताना होगा कि उसके पास बेहतर क्या है। किसी व्यवस्था का विरोध करना आसान है, उसका व्यावहारिक विकल्प तैयार करना कठिन। ब्रिक्स के सामने अब यही कठिन काम है।
नई दिल्ली घोषणा में वैश्विक संस्थाओं में सुधार की बात फिर मजबूती से उठी है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं की संरचना आज भी काफी हद तक उस समय की शक्ति-संरचना को प्रतिबिंबित करती है, जब दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक तस्वीर बिल्कुल अलग थी। भारत जैसे देश का यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस देश की अर्थव्यवस्था और वैश्विक भूमिका इतनी तेजी से बढ़ी है, उसे निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उसी अनुपात में स्थान क्यों नहीं मिलना चाहिए?
लेकिन यहां भी सवाल केवल मांग करने का नहीं है। क्या ब्रिक्स के देश इस मुद्दे पर वास्तव में एक साझा कूटनीतिक रणनीति बना पाएंगे? और उससे भी बड़ा सवाल—क्या वे अपने-अपने राष्ट्रीय हितों से ऊपर उठकर वैश्विक संस्थाओं के पुनर्गठन के लिए लगातार दबाव बनाए रखेंगे? यदि नहीं, तो हर वर्ष घोषणापत्र में सुधार की बात दोहराने का कोई खास अर्थ नहीं रह जाएगा।
आर्थिक क्षेत्र में ब्रिक्स के सामने अवसर भी बड़ा है और चुनौती भी। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान को बढ़ावा देने की चर्चा महत्वपूर्ण है। यह डॉलर के खिलाफ कोई राजनीतिक युद्ध छेड़ने से ज्यादा व्यावहारिक रास्ता है। यदि सदस्य देश अपनी-अपनी मुद्राओं में व्यापार को आसान बना सकें तो इससे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में उनकी स्वायत्तता बढ़ सकती है।
लेकिन यहां भी हमें उत्साह में वास्तविकता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। स्थानीय मुद्रा में व्यापार केवल राजनीतिक इच्छा से नहीं चलता। इसके लिए मजबूत वित्तीय संस्थान, भरोसेमंद भुगतान व्यवस्था, मुद्रा विनिमय की सुविधा और सदस्य देशों के बीच पर्याप्त व्यापार संतुलन जरूरी है। भारत और चीन के बीच विशाल व्यापार के बावजूद भारत का व्यापार घाटा एक गंभीर सवाल है। रूस के साथ भुगतान व्यवस्था की अपनी जटिलताएं हैं। इसलिए केवल ‘डॉलर से मुक्ति’ का नारा समस्या का समाधान नहीं है। असली सवाल है—क्या ब्रिक्स डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए व्यवहारिक आर्थिक ढांचा तैयार कर सकता है?
भारत-चीन संबंध इस पूरे समीकरण की सबसे बड़ी राजनीतिक पहेली हैं। दोनों देश एक ही मंच पर सहयोग की बात करते हैं, लेकिन सीमा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के सवाल अपनी जगह मौजूद हैं। नई दिल्ली सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बातचीत निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है। लेकिन कूटनीति में संकेत और समाधान के बीच काफी अंतर होता है।
भारत चीन के साथ संबंध सुधारना चाहता है, लेकिन अपनी सुरक्षा चिंताओं की कीमत पर नहीं। चीन भारत के साथ आर्थिक संबंध बढ़ाना चाहता है, लेकिन अपनी क्षेत्रीय और वैश्विक रणनीति को छोड़कर नहीं। ऐसे में ब्रिक्स के भीतर भारत-चीन संबंध केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं हैं। इनका असर पूरे संगठन की कार्यक्षमता पर पड़ता है।
यही कारण है कि ब्रिक्स को समझने के लिए एक बात साफ करनी होगी—यह कोई समान विचारधारा वाले देशों का गठबंधन नहीं है। यहां भारत और चीन हैं, रूस और पश्चिम के बीच तनाव है, पश्चिम एशिया के ऐसे देश हैं जिनके आपसी हित हमेशा समान नहीं रहे हैं। फिर भी यदि इतने अलग-अलग हितों वाले देश कुछ साझा मुद्दों पर सहयोग कर सकते हैं तो ब्रिक्स की उपयोगिता साबित होती है।
पश्चिम एशिया इसका अच्छा उदाहरण है। नई दिल्ली घोषणा में क्षेत्रीय तनाव को कम करने, संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। लेकिन क्या ब्रिक्स केवल बयान जारी करने वाला मंच रहेगा या कभी ऐसा प्रभावी तंत्र विकसित करेगा जिसके माध्यम से वह वास्तविक संघर्षों को कम करने में भूमिका निभा सके? यह सवाल आने वाले वर्षों में उसकी विश्वसनीयता तय करेगा।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी यही स्थिति है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता दुनिया की अर्थव्यवस्था और समाज को बदलने जा रही है। लेकिन जिस देश और कंपनी के पास सबसे उन्नत तकनीक होगी, उसके पास भविष्य की शक्ति भी अधिक होगी। यदि कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ देशों और बड़ी कंपनियों के हाथों में केंद्रित हो गई तो डिजिटल असमानता आर्थिक असमानता से भी बड़ी समस्या बन सकती है।
भारत के लिए यह अवसर है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, डिजिटल भुगतान और तकनीक को बड़े पैमाने पर आम नागरिक तक पहुंचाने का भारतीय अनुभव दुनिया के विकासशील देशों के लिए उपयोगी हो सकता है। लेकिन भारत को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि तकनीकी सहयोग किसी एक देश के तकनीकी प्रभुत्व का नया माध्यम न बन जाए। ब्रिक्स का उद्देश्य केवल तकनीक साझा करना नहीं, तकनीकी शक्ति का लोकतंत्रीकरण होना चाहिए।
ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा का सवाल इससे भी ज्यादा सीधे आम आदमी से जुड़ा है। युद्ध कहीं भी हो, उसका असर तेल की कीमतों, गैस, उर्वरक और खाद्य पदार्थों पर पड़ता है। वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान का सबसे बड़ा असर विकासशील देशों पर पड़ता है। यदि ब्रिक्स इन क्षेत्रों में वैकल्पिक और भरोसेमंद आपूर्ति तंत्र विकसित कर पाता है, तो उसकी उपयोगिता कागज से निकलकर जमीन पर दिखाई देगी।
यहीं से भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत ने ब्रिक्स को किसी पश्चिम-विरोधी मंच में बदलने की कोशिश नहीं की है। यह भारत के व्यापक कूटनीतिक दृष्टिकोण के अनुरूप है। भारत अमेरिका के साथ भी संबंध रखता है, रूस के साथ भी और चीन के साथ संवाद भी बनाए रखता है। आज की दुनिया में यही रणनीतिक स्वायत्तता भारत की सबसे बड़ी ताकत है।
लेकिन रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ केवल सभी से संबंध रखना नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि भारत किसी दूसरे देश के एजेंडे का हिस्सा बने बिना अपनी प्राथमिकताएं तय करे। ब्रिक्स के मामले में भारत के सामने यही चुनौती है। यदि ब्रिक्स को केवल अमेरिका और पश्चिम के प्रतिरोध के मंच के रूप में देखा गया तो उसकी उपयोगिता सीमित हो जाएगी। लेकिन यदि इसे अधिक न्यायपूर्ण, प्रतिनिधित्वपूर्ण और संतुलित विश्व व्यवस्था के लिए मंच बनाया गया तो इसका महत्व बहुत बढ़ सकता है।
भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स की गतिविधियां देश के अनेक शहरों तक पहुंचीं। यह अच्छी बात है। लेकिन बैठकों की संख्या उपलब्धि का प्रमाण नहीं होती। अंतरराष्ट्रीय संगठनों की असली ताकत उनके फैसलों के क्रियान्वयन से तय होती है। यही कारण है कि अब भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती है—नई दिल्ली घोषणा को नई दिल्ली की फाइलों में बंद न होने देना।
अध्यक्षता बदल जाएगी। अगला अध्यक्ष कोई और देश होगा। प्राथमिकताएं बदल सकती हैं। राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं। ऐसे में भारत की अध्यक्षता के दौरान लिए गए फैसलों की निरंतरता कैसे बनी रहेगी, यह महत्वपूर्ण प्रश्न है। यदि हर नई अध्यक्षता के साथ ब्रिक्स फिर से अपनी प्राथमिकताएं तय करने लगे तो संगठन घोषणाओं का मंच बनकर रह जाएगा।
और यही वह बिंदु है जहां नई दिल्ली घोषणा की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है।
ब्रिक्स के सामने आज विकल्प स्पष्ट है। वह या तो दुनिया की मौजूदा शक्ति-प्रतिस्पर्धा में एक और शक्ति-गुट बन सकता है, या फिर ऐसी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण में भूमिका निभा सकता है जिसमें किसी एक देश या समूह का वर्चस्व न हो। पहला रास्ता आसान है, क्योंकि उसमें विरोध की राजनीति है। दूसरा कठिन है, क्योंकि उसमें विकल्प देने की जिम्मेदारी है।
भारत को दूसरे रास्ते पर जोर देना चाहिए।
दुनिया इस समय किसी नए शीतयुद्ध की तलाश में नहीं है। युद्धों और आर्थिक संघर्षों से थकी दुनिया को ऐसे मंच की जरूरत है जो संवाद के रास्ते खुले रखे। विकासशील देशों को केवल सहानुभूति नहीं, तकनीक, पूंजी, बाजार और निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी चाहिए। और वैश्विक दक्षिण को केवल भाषण नहीं, संस्थागत ताकत चाहिए।
नई दिल्ली घोषणा ने इन आकांक्षाओं को शब्द दिए हैं। अब शब्दों को परिणामों में बदलना ब्रिक्स की जिम्मेदारी है।
अंततः ब्रिक्स की सफलता इस बात से तय नहीं होगी कि उसने अमेरिका को कितना चुनौती दी, कितने देशों को अपने साथ जोड़ा या कितने पन्नों का घोषणापत्र जारी किया। उसकी सफलता तब होगी जब किसी विकासशील देश के किसान को बेहतर बाजार मिले, किसी छोटे उद्योग को नई आपूर्ति शृंखला मिले, किसी विद्यार्थी को तकनीक तक बेहतर पहुंच मिले, किसी देश को ऊर्जा संकट में वैकल्पिक आपूर्ति मिले और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उन देशों की आवाज मजबूत हो, जिन्हें अब तक केवल निर्णयों का पालन करना पड़ता रहा है।
नई दिल्ली ने दुनिया को दिशा दिखाई है। अब सवाल यह नहीं है कि ब्रिक्स ने क्या कहा। सवाल यह है कि वह कितना कर सकता है।
क्योंकि बदलती हुई विश्व व्यवस्था में घोषणाएं इतिहास नहीं बनातीं—उन घोषणाओं पर किया गया अमल इतिहास बनाता है।