धनबाद डायरी: 'आज जिंदा हैं, कल जमीन निगल जाएगी' - झरिया कोयला खदानों के मुहाने पर सिसकती जिंदगी
धनबाद डायरी: 'आज जिंदा हैं, कल जमीन निगल जाएगी' - झरिया कोयला खदानों के मुहाने पर सिसकती जिंदगी
Updated: Thursday, September 17, 2026, 16:31 [IST]
धनबाद के झरिया और उसके आसपास कोयला सिर्फ जमीन के नीचे नहीं है। यहां रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी भी इसी काले सच से जुड़ी हुई है। यहां लोग हर रात इस डर के साथ सोते हैं कि कहीं सुबह होने से पहले जमीन उन्हें निगल ना ले। सितंबर 2026 के अभी 17 दिन ही बीते हैं और धनबाद में जमीन धंसने की तीन खौफनाक घटनाएं हो चुकी हैं। तीन लोगों की जान जा चुकी है।
वनइंडिया ने झरिया की कोयला खदानों के पास बसे इलाकों का ग्राउंड जीरो से जायजा लिया। लोगों से मिले और उनकी तकलीफ सुनी। जो सामने आया, वो सिर्फ एक खबर नहीं, पूरे कोयलांचल का दर्द है।
पानी की कमी, बिजली की परेशानी, धुआं, धूल, खराब सड़कें, बारिश में घरों में घुसता पानी और जमीन धंसने का डर यहां के लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। जमीन पर जो तस्वीर दिखाई दी, वह सिर्फ खदानों की कहानी नहीं है। यह उन परिवारों की कहानी है जो कोयले की अर्थव्यवस्था के बीच रहकर भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं।
पानी, बिजली और सांस लेने तक की जंग
झरिया-कतरास मोड़ के आसपास बसी बस्तियों में तीन दिक्कतें हर घर की कहानी हैं, पीने के पानी की किल्लत, बिजली का ना होना और प्रदूषण की वजह से सांस फूलना। सड़कें टूटी हैं। बारिश में घरों में पानी घुस आता है। कीचड़ जमा होने से बीमारियां फैलती हैं। कई लोगों को स्किन एलर्जी हो चुकी है। बच्चों को स्कूल जाना तक मुश्किल हो गया है।
बुजुर्ग महिला ने कहा,
"डेढ़ महीने से बिजली नहीं है। ट्रांसफार्मर फुंका पड़ा है। हमारे घर में तो दिन में भी रात जैसा अंधेरा रहता है। मोबाइल चार्ज करने के लिए भी पड़ोसियों का मुंह ताकना पड़ता है। बारिश में सड़क का सारा गंदा पानी घर में घुस जाता है, जिससे पूरा घर नरक बन जाता है।"
नेता वोट मांगने आते हैं, फिर लौटकर नहीं देखते!
बचपन से झरिया में रहने वाली एक महिला का कहना है कि चुनाव के वक्त नेता वादों की झड़ी लगा देते हैं, लेकिन जीतने के बाद पलटकर नहीं आते। नेता सिर्फ चुनाव के वक्त हाथ जोड़कर आते हैं। बड़े-बड़े वादे करते हैं। लेकिन वोट मिलने के बाद वो ऐसे गायब होते हैं जैसे कभी हमें जानते ही ना हों।

एक शख्स का कहना है,
''अब तो मीडिया वालों को भी अपनी तकलीफ बताने का मन नहीं करता। हम मान चुके हैं कि हमारे हालात कभी नहीं बदलेंगे। सरकार कहती है इलाका खाली कर दो... लेकिन हम अपना घर छोड़कर कहां जाएं? उनके लिए सिर्फ हमारा वोट कीमती है, हमारी जान नहीं।"
एक किलोमीटर दूर से पानी, कीचड़ में स्कूल
इलाके की परेशानी सिर्फ बड़ों तक सीमित नहीं है। आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक छात्रा ने बताया कि बारिश के दिनों में उसे रोज कीचड़ से होकर स्कूल जाना पड़ता है। सरकारी स्कूल की पढ़ाई से वह खुश है, लेकिन रास्ते की हालत के चलते कई बार देर हो जाती है।
उसने बताया कि बारिश में घर का कुआं भी गंदे पानी से भर जाता है। फिर वहां से पानी इस्तेमाल करना मुश्किल होता है। पीने का पानी लेने के लिए करीब एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। नहाने और दूसरे घरेलू कामों के लिए परिवार बारिश का पानी बाल्टी में जमा करके इस्तेमाल करता है।
एक दूसरी छात्रा ने कहा,
"सरकारें हमारे जिंदगी की परेशानियों नहीं समझतीं। ऊपर से वादा करके चली जाती हैं। यहां रहकर रोज किन हालात से गुजरते हैं, यह सिर्फ हमें पता है।"

कोयले की धूल और धुएं के बीच सांस लेना
इन इलाकों में लोगों की शिकायत सिर्फ सड़क और पानी तक नहीं है। कोयले की धूल, धुआं और प्रदूषण भी रोज की जिंदगी का हिस्सा है। स्थानीय लोगों ने सांस लेने में दिक्कत, त्वचा पर एलर्जी और बारिश के बाद गंदगी से होने वाली बीमारियों की बात बताई।
झरिया कोलफील्ड में प्रदूषण और खनन का असर कोई नया विषय नहीं है। सरकारी पर्यावरण दस्तावेजों में भी धनबाद-झरिया क्षेत्र में कोयला खदानों, भूमिगत आग, कोयला धूल और दूसरे औद्योगिक स्रोतों को वायु प्रदूषण से जुड़े स्रोतों में गिना गया है। झारखंड के आधिकारिक निगरानी आंकड़ों में झरिया के एक खनन क्षेत्र में पीएम10 का स्तर कई मौकों पर 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ऊपर दर्ज हुआ है।

जमीन धंसने का डर, कोयला खदान में काम करने वाले भी सहमे
खदान में काम करने वाले एक मजदूर ने बताया कि सरकार सुरक्षा का ध्यान रखती है, फिर भी काम के दौरान जमीन धंसने का डर मन से नहीं जाता। धुएं और प्रदूषण से बचने के लिए वो मास्क लगाते हैं, लेकिन अब इसकी आदत सी पड़ गई है।
यह डर बेवजह नहीं है। सितंबर 2026 के सिर्फ 17 दिनों में धनबाद में भू-धंसान की तीन बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें तीन लोगों की जान जा चुकी है।

सितंबर में तीन हादसे, तीन मौतें - कहां-कहां धंसी जमीन
13 सितंबर की सुबह कतरास के रामकनाली ओपी क्षेत्र स्थित केशलपुर कुम्हारपट्टी में अवैध खनन के दौरान अचानक जमीन धंस गई। मलबे में कई लोग दब गए। तीन लोगों की मौत हुई, एक महिला घायल हुई। मृतकों में दो महिलाएं शामिल थीं। स्थानीय लोगों ने खुद मलबा हटाकर तीन लोगों को निकाला, लेकिन अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। लोगों का कहना है कि अवैध खनन की वजह से इसमें और लोग भी फंसे हो सकते हैं।
Photo Credit: ये पेपर कटिंग धनबाद के दैनिक पेपर 'आवाज' की है।
इससे पहले 8 सितंबर को सिजुआ की तीनपटिया बस्ती (मोदीडीह भुइंटा पट्टी) में मकान धंसने से 10 साल के एक बच्चे की मौत हो गई थी, परिवार के चार और लोग घायल हुए थे। गुस्साए लोगों ने धनबाद-कतरास मुख्य मार्ग जाम कर मुआवजे और पुनर्वास की मांग की।
Photo Credit: ये पेपर कटिंग धनबाद के दैनिक पेपर 'आवाज' की है।
फिर 16 सितंबर को छाताबाद के खुशबू मुहल्ले (न्यू आकाशकिनारी कोलियरी, बीसीसीएल गोविंदपुर एरिया-3) में तीसरी बार भीषण भू-धंसान हुआ। दोपहर करीब 3:30 बजे अचानक जमीन हिलने लगी और तेज आवाज के साथ करीब 10 फीट जमीन धंस गई। एक दर्जन से ज्यादा मकान और एक सामुदायिक भवन इसकी चपेट में आए। दीवारों में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गईं।
अफरा-तफरी में लोग जान बचाकर भागे। इस हादसे में तबस्सुम परवीन और 11 साल की रोशनी चोटिल हुईं। सामुदायिक भवन अब प्रभावित परिवारों के लिए अस्थायी आश्रय बना हुआ है।

अगस्त 2026 में DGMS ने रोकी माइनिंग!
अगस्त में ही कोल इंडिया की सहायक कंपनी भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL) ने न्यू आकाशकिनारी कोलियरी में माइनिंग और ब्लास्टिंग पूरी तरह रोक दी थी। यह फैसला खान सुरक्षा महानिदेशालय (DGMS) के सख्त आदेश के बाद लिया गया। DGMS ने 17 अगस्त 2026 से कोयला खान नियम, 2017 के तहत मिली ब्लास्टिंग की मंजूरी वापस ले ली।
वजह है छाताबाद इलाके की जमीन के नीचे दबी बरसों पुरानी, बंद हो चुकी 'IX सीम' कोयला खदान, जिसके ऊपर अचानक जमीन धंस गई, कई घरों और संपत्तियों को नुकसान पहुंचा। इसके बाद जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) के अध्यक्ष और धनबाद के डिप्टी कमिश्नर ने सख्ती दिखाई। DGMS और प्रशासन ने साफ कर दिया है कि जब तक इलाके की वैज्ञानिक जांच पूरी नहीं होती और जमीन की मजबूती साबित नहीं होती, तब तक यहां दोबारा काम शुरू नहीं होगा।
झरिया में कोयला खनन का इतिहास: 110 साल पुरानी आग, 100 वर्ग किमी इलाका खतरे में
झरिया में कोयला खनन 1894 से शुरू हुआ था और 1916 में यहां पहली बार भूमिगत आग की जानकारी मिली थी। यानी करीब 110 साल से यह धरती सुलग रही है। शुरुआत में आग छोटे इलाके तक सीमित थी, लेकिन अवैज्ञानिक खनन और बालू भराई ठीक से ना होने की वजह से यह लगातार फैलती गई। बंद खदानें, जमीन के अंदर खाली जगहें, कमजोर पिलर और पुराने गोफ इन सबकी दशकों पुरानी विरासत अब आबादी के बीच सामने आ रही है।
अनुमान है कि धनबाद कोयलांचल में 100 वर्ग किमी से ज्यादा इलाका भू-धंसान की चपेट में आ सकता है, जिसमें करीब 2.75 लाख लोग खतरे की जद में हैं। बीते आठ महीनों में ही यहां 45 से ज्यादा भू-धंसान की घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं। हालात की गंभीरता को देखते हुए प्रधानमंत्री के सलाहकार तरुण कपूर ने 31 अगस्त और 1 सितंबर को खुद धनबाद कोयलांचल का दौरा किया, बीसीसीएल की खनन गतिविधियों और पुनर्वास कार्यों की समीक्षा की।

मास्टर प्लान तो बना, राहत कब मिलेगी
लोगों के पुनर्वास के लिए झरिया मास्टर प्लान को केंद्र सरकार ने 2009 में ही मंजूरी दी थी, जिसे एशिया की सबसे बड़ी पुनर्वास परियोजना कहा जाता है। हाल ही में केंद्र ने 5,940 करोड़ रुपये की संशोधित योजना को भी मंजूरी दे दी। लेकिन जमीन पर काम अब भी अधूरा है।
कोयलांचल नागरिक एकता मंच के अध्यक्ष राजकुमार अग्रवाल कहते हैं कि मास्टर प्लान के तहत बनी टाउनशिप में लोगों के लिए आजीविका का कोई साधन नहीं है, वहां मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं यही वजह है कि लोग नई जगह जाने को तैयार नहीं होते।
आखिर परवाह किसे है?
एक तरफ जमीन के नीचे 110 साल से आग जल रही है, दूसरी तरफ हर महीने घर धंस रहे हैं, जानें जा रही हैं। योजनाएं बनती हैं, बजट मंजूर होता है, अधिकारी दौरा करते हैं, मगर झरिया-कतरास की गलियों में रहने वाले लोगों का दिन आज भी उसी डर के साथ शुरू और खत्म होता है।
झरिया के लोगों की मांग बहुत बड़ी नहीं है। उन्हें साफ पानी चाहिए। घर में बिजली चाहिए। बच्चों के लिए सुरक्षित रास्ता चाहिए। प्रदूषण से राहत चाहिए। और सबसे बढ़कर ऐसा भरोसा चाहिए कि जिस जमीन पर उनका घर खड़ा है, वह अगली बारिश या अगली खुदाई में अचानक गायब नहीं होगी।