जहरीली शराब के खिलाफ मनमाने कठोर कानून को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया, नई गाइडलाइन जारी

नई दिल्ली, 20 सितंबर 2026: जब भी कोई घटना होती है, पब्लिक अपराधियों के खिलाफ कठोर कानून की मांग करती है, लेकिन भारत का संविधान, संतुलन और नियंत्रण के सिद्धांत पर काम करता है। महाराष्ट्र सरकार ने जहरीली शराब के खिलाफ कठोर कानून बनाया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसको रद्द कर दिया क्योंकि महाराष्ट्र सरकार का कानून संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता एवं गैर-मनमानापन) और अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यापार व व्यवसाय की स्वतंत्रता) का उल्लंघन कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने भारत के सभी राज्यों के लिए, जहरीली अथवा अवैध शराब की रोकथाम हेतु नई गाइडलाइन जारी की है। 

मामले की पृष्ठभूमि और क्रमबद्ध कहानी

इस पूरे कानूनी विवाद की जड़ें वर्ष 1991 में मुंबई के अंधेरी (उपनगरीय) स्थित 'छाया बार' (Chhaya Bar) में हुई एक भीषण जहरीली शराब त्रासदी से जुड़ी हैं। वहां लगभग 250 लोगों ने शराब समझकर मेथनॉल (मिथाइल अल्कोहल) का सेवन कर लिया था, जिसके परिणामस्वरूप 93 लोगों की मौत हो गई थी। इस त्रासदी के कारणों की जांच और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के उपाय सुझाने हेतु महाराष्ट्र सरकार ने अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक पी.आर. पार्थसारथी (P.R. Parthasarthy) की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। समिति (पी.आर. पार्थसारथी समिति) ने राज्य सरकार को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी, जिसमें कई प्रशासनिक व कानूनी सिफारिशें की गईं। 

जहरीली शराब के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार का कड़ा कानून

समिति की सिफारिशों के क्रियान्वयन के नाम पर महाराष्ट्र सरकार के 'चिकित्सा शिक्षा और औषधि विभाग' ने 21 जनवरी 2011 को अधिसूचना संख्या DRG 2006/1006/C.R. 659/06/DRUGS-2 जारी की। इसके तहत पॉइज़न्स एक्ट, 1919 (Poisons Act, 1919) की धाराओं के अंतर्गत 'महाराष्ट्र पॉइज़न रूल्स, 1972' में संशोधन कर नियम 18A, 18B और 18C जोड़े गए तथा मेथनॉल को ज़हर (Poison) की अनुसूची में शामिल किया गया:

नियम 18A(1): विक्रेताओं के लिए अनिवार्य किया गया कि वे मेथनॉल बेचने से पहले खरीदार का लाइसेंस 'फॉर्म A' (Form A) के माध्यम से सत्यापित कर उसके उपयोग की पुष्टि करेंगे।

नियम 18A(2): औषधि (Drug) निर्माण को छोड़कर अन्य सभी औद्योगिक खरीदारों को मेथनॉल बेचने से पहले प्रति 100 लीटर मेथनॉल में 1 ग्राम मेथिलीन कारमाइन (methylene carmine - रंग) और 4 ग्राम डेनाटोनियम सेकेराइड (denatonium saccharide - कड़वाहट) मिलाना अनिवार्य कर दिया गया।

नियम 18B: वैध 'फॉर्म A' लाइसेंस के बिना मेथनॉल का स्टॉक/कब्जा पाए जाने पर उसे जब्त करने का प्रावधान किया गया।

मामला सुप्रीम कोर्ट तक क्यों पहुंचा

इन नियमों के कारण उद्योगों के अंतिम उत्पादों की गुणवत्ता खराब होने लगी, जिसके खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में रिट याचिकाएं दायर की गईं। हाईकोर्ट ने 24 फरवरी 2012 को अंतरिम राहत देते हुए गैर-औषधि निर्माताओं को खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) को खरीद आदेश जमा करने की शर्त पर मेथनॉल खरीदने की अनुमति दी। हालांकि, 3 मई 2019 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने इन याचिकाओं को खारिज करते हुए नियमों की वैधता को बरकरार रखा। इसके बाद पीड़ित उद्योगों (जैसे मेसर्स बालाजी फॉर्मेलिन प्रा. लि., इंडियन केमिकल काउंसिल, द केमिकल एंड अल्कली मर्चेंट्स एसोसिएशन) ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया। 

उद्योगों के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री बलबीर सिंह के तर्क

मेथनॉल फॉर्मलाडेहाइड, पैराफॉर्मलाडेहाइड, डाई, पेंट, रेजिन, और जीवनरक्षक दवाओं (जैसे मेटफॉर्मिन, रैनिटिडिन) के निर्माण में मुख्य कच्चा माल है। इसमें रंग और कड़वाहट मिलाने से अंतिम उत्पाद दूषित हो जाते हैं, रंग बदल जाता है और रासायनिक कैटेलिस्ट नष्ट हो जाते हैं। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) अति-शुद्ध फॉर्मलाडेहाइड की मांग करता है, जिसे रंगीन मेथनॉल से नहीं बनाया जा सकता। इसी तरह आरती इंडस्ट्रीज, अल्काइल केमिकल्स, बालाजी एमायन्स, और थर्मो फिशर साइंटिफिक जैसी कंपनियों के उत्पाद बाजार में अस्वीकार्य हो गए। 

  • नियम 18A(2) में जिस रंग (मेथिलीन कारमाइन) का उल्लेख किया गया था, उसमें कार्सिनोजेनिक (कैंसर कारक) तत्व मौजूद हैं।
  • नियम 18A(1) के तहत 'फॉर्म A' से खरीदार का सत्यापन असंभव है क्योंकि 'फॉर्म A' केवल विक्रेताओं/स्टॉकिस्टों के लिए होता है, जबकि वास्तविक औद्योगिक उपभोक्ता 'फॉर्म B' परमिट धारक होते हैं।

यह नियम अत्यधिक और अननुपातिक (disproportionate) है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(g) का हनन करता है। 

महाराष्ट्र राज्य सरकार के अधिवक्ता श्री आनंद दिलीप लांडगे के तर्क

  • मेथनॉल एक रंगहीन व गंधहीन घातक विष है, जिसे शराब में आसानी से मिलाया जा सकता है। कड़वाहट और रंग मिलाने से इसकी दृश्य पहचान आसान होती है और इसका दुरुपयोग या दुर्भावनापूर्ण सेवन रुकता है।पॉइज़न्स एक्ट, 1919 की धारा 2 और 8 के तहत राज्य सरकार को ज़हर की बिक्री की शर्तें और स्वरूप निर्धारित करने का पूर्ण अधिकार है।
  • Landmark Judgment: राज्य ने सुप्रीम कोर्ट के ही लैंडमार्क फैसले गुडविल पेंट एंड केमिकल इंडस्ट्री बनाम भारत संघ (1992 Supp (1) SCC 16) का हवाला दिया, जिसमें माना गया था कि खतरनाक विषैले पदार्थों के व्यापार पर वैधानिक प्रतिबंध लगाना जनहित में उचित है।
  • सरकार केवल बिक्री की शर्तों को विनियमित कर रही है, उत्पादन या आयात पर प्रतिबंध नहीं लगा रही है।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और कानूनी विश्लेषण

सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की विस्तृत सुनवाई के बाद माना कि राज्य सरकार का उद्देश्य भले ही जनस्वास्थ्य की रक्षा करना था, लेकिन बनाए गए नियम मनमाने, अत्यधिक और अननुपातिक हैं।

1. नियम 18A(1) और 18B पर कोर्ट का रुख:

कोर्ट ने पाया कि 'फॉर्म A' केवल विक्रेताओं के लिए होता है। नियम 18A(1) और 18B औद्योगिक उपभोक्ताओं द्वारा 'फॉर्म B' के तहत प्राप्त वैध परमिट को पूरी तरह से निष्प्रभावी और निरर्थक बना देते हैं। वैध खरीदारों पर जब्ती का खतरा पैदा करना राज्य की अत्यधिक और अनुचित कार्रवाई है।

2. नियम 18A(2) पर कोर्ट का रुख:

पार्थसारथी समिति की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि जहरीली शराब की त्रासदियां वैध बिक्री बिंदु से नहीं, बल्कि अवैध चैनलों से मेथनॉल की हेराफेरी (diversion), चोरी (pilferage), और भ्रष्टाचार के कारण होती हैं।

अवैध शराब बनाने वाले असामाजिक तत्व मेथनॉल में मिलाए गए रंग और कड़वाहट को अन्य स्वादों व रंगों से आसानी से छिपा (mask) सकते हैं। अतः यह नियम मूल समस्या को हल किए बिना वैध उद्योगों पर निरंतर वित्तीय और तकनीकी बोझ डालता है।

'के.एस. पुट्टास्वामी (2017)' केस के आधार पर अनुपातिकता का परीक्षण 

सुप्रीम कोर्ट ने प्रख्यात फैसले के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017 10 SCC 1) में तय किए गए 4-स्तरीय परीक्षण को लागू किया:

  • जनहानि रोकना एक वैध लक्ष्य है।
  • क्या नियम इस लक्ष्य को प्राप्त करते हैं? नहीं, क्योंकि अवैध हेराफेरी पर इसका कोई नियंत्रण नहीं है।
  • क्या कम प्रतिबंधात्मक उपाय उपलब्ध थे? हां, टैंकरों की सख्त सीलिंग, नियमित ऑडिट और लाइसेंस शर्तों को कड़ा करके इसे रोका जा सकता था।
  • उद्योगों को होने वाला स्थायी नुकसान राज्य द्वारा दावा किए गए "संभावित लाभ" की तुलना में अत्यधिक भारी है।

शराबबंदी और त्रासदियों पर कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणियां:

न्यायालय ने गुजरात के भावनगर और मध्य प्रदेश के सागर में हाल ही में हुई जहरीली शराब त्रासदियों का उल्लेख करते हुए कहा कि पूर्ण शराबबंदी अक्सर इस व्यापार को भूमिगत (underground) धकेल देती है। कोर्ट ने प्रसिद्ध न्यायविद नानी पालखीवाला (Nani Palkhiwala) के 1937 के एक लेख (जो जामे जमशेद में प्रकाशित हुआ था) का उद्धरण दिया, जिसमें उन्होंने लिखा था कि "जब सरकार शराब को प्रतिबंधित करना शुरू करती है, तो यह शराब को बढ़ावा देने पर समाप्त होती है... मनुष्य, मनुष्य के स्वभाव को नहीं हरा सकता।"

कोर्ट ने शराबबंदी से जुड़े 5 प्रमुख दुष्परिणाम भी रेखांकित किए: 

राजस्व हानि, क्रियान्वयन पर खर्च, भ्रष्टाचार, अवैध कसीदगी (illegal distilling), और नशीली दवाओं का बढ़ता प्रकोप।

देशभर के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए निर्देश

मामला बंद करने से पहले, सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य में जहरीली शराब की त्रासदियों को रोकने के लिए सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए:

  • विभागों का समन्वय: आबकारी, पुलिस, परिवहन, उद्योग, स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग मिलकर अवैध आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ें। नगर निगम स्कूलों के खुले मैदानों का उपयोग अवैध शराब भंडारण हेतु न होने पाए।
  • टैंकरों की सीलिंग व परिवहन: मेथनॉल का परिवहन केवल समर्पित (dedicated) टैंकरों में हो, जिन्हें प्रस्थान बिंदु (dispatch) पर 'टैम्पर-एविडेंट सील' (tamper-evident seal) से बंद किया जाए और गंतव्य पर ही खोला जाए।
  • कड़े लाइसेंस नियम व ऑडिट: अनुचित लाभ उठाने वालों के लाइसेंस रद्द किए जाएं, बिना इस्तेमाल हुए मेथनॉल की अनिवार्य वापसी (return) तय हो, और स्टॉक का नियमित मिलान किया जाए।
  • आपदा प्रबंधन व नशामुक्ति: अस्पतालों में विशेष विष-रोधी दवाओं की उपलब्धता, नशामुक्ति केंद्रों का संचालन और प्रभावित परिवारों के लिए परामर्श केंद्र स्थापित किए जाएं।

सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क जजमेंट का निष्कर्ष

सर्वोच्च न्यायालय ने 'महाराष्ट्र पॉइज़न रूल्स, 1972' के नियम 18A और 18B को अंसवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया और याचिकाओं को स्वीकार कर लिया। कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि इस फैसले की प्रतियां देश के सभी उच्च न्यायालयों और सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजी जाएं ताकि इसे व्यापक रूप से लागू किया जा सके। 

यह फैसला न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ द्वारा 'मेसर्स बालाजी फॉर्मेलिन प्रा. लि. एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य' (Writ Petition (C) No. 893/2019 एवं अन्य सम्बद्ध मामले) में सुनाया गया। रिपोर्ट: उपदेश अवस्थी (विधि सलाहकार एवं पत्रकार)।