चुनाव आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी से पहले यह न्यूज़ जरूर पढ़ें

नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026: चुनाव आयोग के मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज एक बड़ा घटनाक्रम हुआ है। जो लोग कानून और संविधान की भाषा नहीं जानते, वह इस घटनाक्रम को अपने नजरिए से प्रस्तुत कर रहे हैं परंतु यदि आप इस मामले पर कोई टिप्पणी करना चाहते हैं, तो पहले इस न्यूज़ को ध्यान से पढ़ लीजिए, क्योंकि केवल यही पर आपको पूरा मुद्दा, सामान्य सरल भाषा में संविधान के अनुच्छेद का उल्लेख करते हुए, बिना किसी माइंडसेट और नॉरेटिव के स्पष्ट रूप से समझाया गया है। यह न्यूज़ LAW Students के लिए भी बेहद उपयोगी है: 

मामला क्या है, सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचा

यह मामला 'डॉ. जया ठाकुर एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य' (Dr. Jaya Thakur & Ors. v. Union of India & Anr. - Writ Petition (Civil) No. 14 of 2024) का है, जिसमें देश के नागरिक समाज, सामाजिक संगठनों और जनहित विचारकों ने एकजुट होकर केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नए कानून को चुनौती दी है। इस याचिका में केंद्र सरकार के मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 (Chief Election Commissioner and other Election Commissioners Act, 2023) की संवैधानिक वैधता पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। 

जजों के बीच गंभीर मतभेद

सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने इस संवेदनशील मामले पर 5 दिनों तक विस्तृत सुनवाई की। हालांकि, जजों के बीच प्रक्रियात्मक मुद्दे पर गंभीर मतभेद (Split Verdict) होने के कारण अब यह ऐतिहासिक मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास संविधान पीठ (Constitution Bench) के गठन हेतु भेज दिया गया है। 

लोकतंत्र की साख और 2023 के नए कानून का विवाद

इस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत डॉ. जया ठाकुर, गोपाल सिंह, नमन श्रेष्ठ, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) और लोक प्रहरी (महामंत्री एस.एन. शुक्ला के माध्यम से) द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 (Article 32) के तहत दायर रिट याचिकाओं से हुई। याचिकाओं में 2023 के अधिनियम की धारा 7 (Section 7), धारा 6 (Section 6) और धारा 8(2) [Section 8(2)] को संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और अनुच्छेद 324 (स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव) का उल्लंघन बताते हुए असंवैधानिक (ultra vires) घोषित करने की मांग की गई है। 

विवाद की मुख्य जड़ धारा 7 है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति को सिफारिश भेजने वाली सिलेक्शन कमेटी (Selection Committee) का ढांचा तय किया गया है। इस समिति में तीन सदस्य शामिल हैं:

  • प्रधानमंत्री (अध्यक्ष/Chairperson)
  • लोकसभा में विपक्ष के नेता या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता (सदस्य/Member)
  • प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (सदस्य/Member)

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को बाहर रखकर और एक कैबिनेट मंत्री को शामिल करके केंद्र सरकार ने चयन प्रक्रिया पर कार्यपालिका का वर्चस्व (Executive Dominance) कायम कर दिया है। इसके अतिरिक्त, धारा 6 के तहत कानून मंत्री की अध्यक्षता में बनी 'सर्च कमेटी' (Search Committee) और धारा 8(2) के तहत पैनल से बाहर के व्यक्ति को चुनने के अधिकारों को भी चुनौती दी गई है। 

'अनूप बरनवाल' का लैंडमार्क जजमेंट और संसद का नया कानून

इस विवाद की पृष्ठभूमि को समझने के लिए मार्च 2023 में आए सुप्रीम कोर्ट की 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ के लैंडमार्क जजमेंट अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (Anoop Baranwal v. Union of India) को जानना आवश्यक है। संविधान के लागू होने के 73 वर्षों बाद भी संसद द्वारा चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर कोई कानून न बनाए जाने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने एक वैधानिक शून्यता (Legislative Vacuum) पाई थी। तब कोर्ट ने भारतीय संविधान में अनुच्छेद 142 (Article 142) के विशेषाधिकार का उपयोग करते हुए एक अंतरिम व्यवस्था (pro tem arrangement) लागू की थी। कोर्ट ने आदेश दिया था कि जब तक संसद कोई कानून नहीं बना देती, तब तक चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल रहेंगे।

हालांकि, संसद ने दिसंबर 2023 में नया कानून पारित करके CJI की जगह एक कैबिनेट मंत्री को समिति में शामिल कर दिया। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि संसद ने अदालती फैसले की मूल भावना और स्वतंत्रता के सिद्धांत को विधायिका के जरिए निष्प्रभावी करने का प्रयास किया है। 

याचिकाकर्ताओं के वकीलों के धारदार तर्क: "जब कप्तान ही अंपायर चुनेगा तो निष्पक्षता कैसी?"

अदालत में याचिकाकर्ताओं और सहयोगी पक्षकारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री विजय हंसारिया, श्री संजय पारिख, श्री गोपाल शंकरनारायणन, श्री शादान फरासत, श्री प्रशांत भूषण, श्री कलीश्वरम राज और श्री एस.एन. शुक्ला ने पुरजोर तरीके से पक्ष रखा। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने निम्नलिखित प्रमुख कानूनी तर्क पेश किए:

2:1 का बहुमत और कार्यपालिका का वीटो: वकीलों ने तर्क दिया कि समिति में प्रधानमंत्री और उनके ही मनोनीत कैबिनेट मंत्री के होने से कार्यपालिका को 2:1 का स्पष्ट बहुमत मिल जाता है। कैबिनेट मंत्री संविधान के अनुच्छेद 75(3) [Article 75(3)] के तहत सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility) से बंधे होते हैं, इसलिए वे कभी अपने प्रधानमंत्री के विरुद्ध रुख नहीं ले सकते। ऐसे में विपक्ष के नेता की मौजूदगी केवल औपचारिक (Ornamental) बनकर रह जाती है।

परसेप्शन टेस्ट और बेसिक स्ट्रक्चर: स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर (Basic Structure Doctrine) का हिस्सा हैं। वकीलों ने तर्क दिया कि यदि किसी क्रिकेट मैच में एक टीम का कप्तान ही अंपायर को चुनेगा और उसकी टीम जीत जाएगी, तो भले ही निर्णय सही हों, उन पर संदेह की परत बनी रहेगी (Perception Test)। ECI को केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि जनता की नजरों में निष्पक्ष दिखना भी चाहिए।

न्यायिक मिसालों को पलटने का आरोप: वकीलों ने तर्क दिया कि Anoop Baranwal का फैसला अनुच्छेद 141 के तहत बाध्यकारी है और संसद सीधे तौर पर अदालती फैसले को खारिज नहीं कर सकती। इसके लिए उन्होंने Shri Prithvi Cotton Mills, Madan Mohan Pathak, In re: Cauvery Water Disputes Tribunal और PUCL v. Union of India जैसे लैंडमार्क फैसलों का हवाला दिया।

देरी करने का पैंतरा: केंद्र सरकार द्वारा अंतिम समय पर मामले को 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजने (Reference) की मांग का वकीलों ने कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि 2 साल तक मामला लंबित रहने के बाद ऐसी मांग करना केवल निर्णय में देरी करने की रणनीति है। इसके समर्थन में Madras Bar Association v. Union of India, PUCL v. UOI, Shrimanth Balasaheb Patil और State of J&K v. Thakur Ganga Singh के फैसलों का उल्लेख किया गया।

केंद्र सरकार का पलटवार: "संसद की संप्रभुता और प्रधानमंत्री पर संवैधानिक विश्वास"

भारत सरकार (Respondents/Defenders) की ओर से अटॉर्नी जनरल श्री आर. वेंकटरमणी (Mr. R. Venkataramani) और सॉलिसिटर जनरल श्री तुषार मेहता (Mr. Tushar Mehta) ने 2023 के अधिनियम का बचाव किया:

अनुच्छेद 324(2) और विधायी अधिकार: केंद्र ने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 324(2) स्पष्ट रूप से कहता है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति "संसद द्वारा बनाए जाने वाले कानून के अधीन" होगी। Anoop Baranwal मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई व्यवस्था केवल एक अंतरिम व्यवस्था (pro tem measure) थी। संसद द्वारा कानून बनाते ही वह अंतरिम व्यवस्था समाप्त हो गई।

संवैधानिक विश्वास (Constitutional Trust): सॉलिसिटर जनरल ने संविधान पीठ के फैसले Manoj Narula v. Union of India और संविधान सभा की बहसों (Constituent Assembly Debates) से डॉ. बी.आर. अंबेडकर के कथनों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का पद जनता के सर्वोच्च संवैधानिक विश्वास का प्रतीक है और यह मानना गलत है कि उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोग निष्पक्षता से कार्य नहीं करेंगे।

कॉलेजियम सिस्टम से तुलना: सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि जिस प्रकार जजों की नियुक्ति के 'कॉलेजियम सिस्टम' (Collegium System) में शक्ति पृथक्करण (Separation of Powers) के तहत किसी बाहरी व्यक्ति या कार्यपालिका का हस्तक्षेप नहीं होता, उसी प्रकार चुनाव आयोग के गठन में CJI या किसी बाहरी सदस्य को न रखना शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के अनुकूल है।

संविधान पीठ की मांग: केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 145(3) [Article 145(3)] और सुप्रीम कोर्ट रूल्स, 2013 (Order XXXVIII, Rule 1) का हवाला देकर कहा कि चूंकि 2023 अधिनियम की वैधता पहली बार चुनौती के घेरे में है और यह संविधान की व्याख्या से जुड़ा गंभीर प्रश्न (Substantial question of law) उठाता है, इसलिए इसे अनिवार्य रूप से कम से कम 5 जजों की संविधान पीठ (Constitution Bench) को भेजा जाना चाहिए।

दो जजों की पीठ में विभाजन: अलग-अलग न्यायिक सोच

मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस दीपांकर दत्ता (Justice Dipankar Datta) और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा (Justice Satish Chandra Sharma) की पीठ ने विस्तृत मंथन के बाद अलग-अलग राय (Split Opinion) व्यक्त की:

रेफरेंस की जरूरत नहीं; कार्यपालिका का वर्चस्व चिंताजनक

जस्टिस दीपांकर दत्ता ने केंद्र सरकार की संविधान पीठ को मामला भेजने की मांग को खारिज कर दिया। उनका मानना था कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत Anoop Baranwal और PUCL मामलों में पहले ही तय हो चुके हैं, और इस बेंच को खुद मामले के गुणों-दोषों (Merits) पर निर्णय सुनाना चाहिए। अपने अवलोकन में जस्टिस दत्ता ने माना कि चयन समिति में कैबिनेट मंत्री की मौजूदगी से कार्यपालिका को प्रभावी वीटो मिल जाता है, जिससे विपक्ष के नेता की भूमिका महज नाममात्र की रह जाती है।

इसके साथ ही, सॉलिसिटर जनरल द्वारा कॉलेजियम सिस्टम ("Judges appoint Judges") से की गई तुलना का करारा जवाब देते हुए जस्टिस दत्ता ने स्पष्ट किया कि "जज ही जजों को नियुक्त करते हैं" यह एक फैलाया गया मिथक (Myth) है। उन्होंने रेखांकित किया कि जजों की नियुक्ति में खुफिया एजेंसियों की जांच से लेकर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर तक कार्यपालिका की सक्रिय भूमिका होती है और कई बार सरकार कॉलेजियम की सिफारिशों को रोककर (Piecemeal approval) अपनी मनमर्जी चलाती है। उन्होंने डॉ. बी.आर. अंबेडकर के 1951 और 1952 के ऐतिहासिक भाषणों का हवाला देते हुए चुनाव प्रक्रिया पर कार्यपालिका के नियंत्रण के खतरों के प्रति आगाह किया।

नया कानून पहली बार आया है, संविधान पीठ ही तय करे

इसके विपरीत, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने केंद्र सरकार के कानूनी तर्कों से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि 2023 अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर अब तक सुप्रीम कोर्ट का कोई आधिकारिक फैसला नहीं आया है। संविधान के अनुच्छेद 145(3) का स्पष्ट निर्देश है कि जब संविधान की व्याख्या का कोई नया और मौलिक सवाल उठता है, तो उसे 5 जजों की संविधान पीठ द्वारा ही तय किया जाना चाहिए।

अंतिम निर्देश: मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पाले में गेंद

प्रक्रियात्मक मुद्दे पर जजों में सहमति न बन पाने के कारण पीठ ने एक संयुक्त आदेश जारी कर मामले की फाइलों को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। अब CJI 2023 अधिनियम की धारा 7, 6 और 8 की संवैधानिक वैधता तय करने के लिए संविधान पीठ (Constitution Bench) के गठन पर निर्णय लेंगे।

इसके साथ ही, दोनों न्यायाधीशों ने अदालती संदर्भों (References) के निपटारे में सालों-साल (5 से 20 वर्ष) लगने पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने उदाहरण दिया कि Anoop Baranwal मामले को तय होने में 8 साल लगे थे और हाल ही में Jai Bir Singh मामले में 7-जजों की पीठ से 9-जजों की पीठ तक पहुंचने में 9 साल लग गए।

इस विलंब को रोकने के लिए दोनों न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि शुद्ध संवैधानिक प्रश्नों के त्वरित और प्राथमिकता के आधार पर निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक स्थायी 5-न्यायाधीशों की पीठ (Permanent 5-Judge Bench) के गठन की संभावना पर गंभीरता से विचार किया जाए।

भारतीय लोकतंत्र, चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के लिहाज से अब इस मामले पर गठित होने वाली संविधान पीठ के आने वाले फैसले पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहेंगी।