टाटा ग्रुप की सबसे बड़ी मीटिंग में रुकावट, रास्ता निकालने के लिए ट्रिब्यूनल जाएगी कंपनी!

टाटा ग्रुप की सबसे बड़ी मीटिंग में रुकावट, रास्ता निकालने के लिए ट्रिब्यूनल जाएगी कंपनी!

टाटा ग्रुपImage Credit source: Getty Images

Tata Sons vs Tata Trusts: टाटा संस के भीतर इन दिनों काफी हलचल मची हुई है. देश के सबसे बड़े कारोबारी घरानों में से एक टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस अगले एक महीने के भीतर अपनी वार्षिक आम बैठक (AGM) बुलाने की योजना बना रही है. कंपनी के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती बैठक का कोरम (न्यूनतम सदस्यों की संख्या) पूरा करना है. सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) पर लगी रोक के कारण ये कोरम पूरा नहीं हो पा रहा है. ऐसे में टाटा संस अब अपने अहम कॉर्पोरेट मामलों को निपटाने के लिए नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) का दरवाजा खटखटाने पर विचार कर रहा है. कंपनी के कई अहम फैसले इस बैठक पर टिके हैं, जिनमें एन चंद्रशेखरन की बतौर डायरेक्टर दोबारा नियुक्ति का मामला सबसे बड़ा है.

AGM में देरी की मुख्य वजह

टाटा संस को अपनी वार्षिक आम बैठक 18 अगस्त को ही करनी थी, लेकिन कोरम पूरा न होने की वजह से इसे टालना पड़ा. इसके बाद कंपनी को रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (RoC) से तीन महीने का एक्सटेंशन भी मिल चुका है. मामले से जुड़े लोगों का कहना है कि महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर ने सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) की बैठकों या किसी भी तरह के फैसले लेने पर रोक लगाई हुई है. टाटा संस के नियमों (आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के आर्टिकल 86) के मुताबिक, किसी भी आम बैठक का कोरम तब तक पूरा नहीं माना जाता, जब तक उसमें कम से कम पांच सदस्य व्यक्तिगत रूप से मौजूद न हों. इनमें सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) तथा SRTT द्वारा संयुक्त रूप से नामित कम से कम एक प्रतिनिधि का होना अनिवार्य है. ये नियम तब तक लागू है जब तक दोनों ट्रस्ट की टाटा संस में कम से कम 40 फीसदी हिस्सेदारी है.

आंकड़ों की बात करें तो SDTT के पास टाटा संस की 27.98 फीसदी और SRTT के पास 23.56 फीसदी हिस्सेदारी है. दोनों को मिलाकर ये 51.54 फीसदी बैठता है, जबकि अन्य परोपकारी टाटा ट्रस्टों को मिला लें तो ये कुल हिस्सेदारी करीब 66 फीसदी हो जाती है. SRTT पर रोक होने के कारण दोनों ट्रस्ट मिलकर अपना प्रतिनिधि नहीं चुन पा रहे हैं, जिससे बैठक का कोरम ही पूरा नहीं हो पा रहा है.

नोएल टाटा बनाम अन्य डायरेक्टर्स

इस अहम बैठक का सीधा असर एन चंद्रशेखरन की बतौर डायरेक्टर नियुक्ति पर पड़ना है. पिछले गुरुवार को हुई टाटा संस की बोर्ड बैठक में दो बड़े मुद्दों पर टकराव देखने को मिला था. पहला मुद्दा एन चंद्रशेखरन को दोबारा चेयरमैन बनाने का था, जबकि दूसरा मुद्दा कंपनी की लिस्टिंग से जुड़ा था. टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इन दोनों ही प्रस्तावों का कड़ा विरोध किया था, जबकि बोर्ड के बाकी डायरेक्टर्स ने इनका पूरा समर्थन किया था. विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक कोई वैध AGM नहीं हो जाती, तब तक चंद्रशेखरन डायरेक्टर के पद पर बने रहेंगे.

NCLT से टाटा संस की उम्मीदें

अगर SRTT पर लगी रोक के कारण कोरम की समस्या हल नहीं होती है, तो टाटा संस कानूनी रास्ता अपनाते हुए NCLT के पास जाएगी. कंपनी कानून 2013 की धारा 97(1) के तहत NCLT के पास ये अधिकार है कि वो कंपनी को AGM बुलाने का निर्देश दे सकता है. ट्रिब्यूनल चाहे तो कोरम के सामान्य नियमों को भी दरकिनार कर सकता है. लॉ फर्म चंडोक एंड महाजन की मैनेजिंग पार्टनर शफाक उरैजी सप्रे के मुताबिक, NCLT ये भी आदेश दे सकता है कि बैठक में मौजूद एक सदस्य को ही कोरम मान लिया जाए. इससे टाटा संस को SRTT-SDTT के संयुक्त प्रतिनिधि के बिना भी बैठक करने का कानूनी रास्ता मिल जाएगा. कंपनी के एक अधिकारी ने भी साफ किया है कि टाटा संस को कई मुद्दों पर तेजी से काम करना है, इसलिए कानूनी दायरों में रहकर जल्द से जल्द AGM होना बहुत जरूरी है.

कानूनी दांवपेच के बीच फंसा फैसला

हालांकि NCLT से राहत मिलना इतना आसान भी नहीं लग रहा है. कानूनी विशेषज्ञों की मानें तो NCLT का आदेश सिर्फ कंपनी कानून के तहत AGM के संचालन को रेगुलेट कर सकता है. ये चैरिटी कमिश्नर के उस आदेश को रद्द नहीं कर सकता, जो SRTT पर लागू है. मॉर्फिस मैनेजमेंट सर्विसेज के पार्टनर विमल तापड़िया का कहना है कि अगर NCLT बैठक की इजाजत दे भी देता है, तो भी मूल विवाद पूरी तरह खत्म नहीं होगा. प्रभावित शेयरधारक भविष्य में इस बैठक या इसमें लिए गए प्रस्तावों की वैधता को चुनौती दे सकता है, जिससे एक नई कानूनी लड़ाई शुरू हो सकती है.

लॉ फर्म एएनबी लीगल की डिस्प्यूट रेजोल्यूशन हेड श्रेनी शेट्टी ने बताया कि चैरिटी कमिश्नर के आदेश के तहत SRTT को जांच रिपोर्ट आने तक अपनी बैठक टालनी पड़ी है. ऐसे में SRTT के लिए किसी प्रतिनिधि को नामित करना संभव नहीं है. उनका मानना है कि ट्रिब्यूनल के पास बैठक बुलाने की व्यापक शक्तियां हैं, लेकिन NCLT के लिए शेयरधारकों के उन अधिकारों को नजरअंदाज करना काफी मुश्किल होगा, जो कंपनी के नियमों में स्पष्ट रूप से पहले से तय किए गए हैं. अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि टाटा संस अपनी अटकी हुई व्यावसायिक योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए इस कानूनी उलझन से कैसे बाहर निकलता है.

विभव शुक्ला

विभव शुक्ला

विभव शुक्ला वर्तमान में TV9 हिंदी में सीनियर सब-एडिटर के तौर पर बिजनेस डेस्क पर कार्यरत हैं. पत्रकारिता में उन्हें छह वर्षों का अनुभव है. विभव मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के रहने वाले हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की थी. इसके बाद वह Inshorts और गुजरात फर्स्ट जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े रहे हैं.

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