भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन: सिर्फ साफ ईंधन नहीं, बल्कि भविष्य की ऊर्जा क्रांति की शुरुआत
निशान्त, Climate कहानी, कोलकाता: हरियाणा के जींद–सोनीपत रेलखंड (करीब 90 किलोमीटर) पर भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन शुरू हुई है। यह सिर्फ़ एक नई ट्रेन नहीं, बल्कि भारत के ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की चलती-फिरती प्रयोगशाला है।
हाइड्रोजन ट्रेन चलती कैसे है?
इस ट्रेन में डीज़ल इंजन नहीं है। इसके ऊपर लगे विशेष टैंकों में हाइड्रोजन गैस भरी जाती है। यह हाइड्रोजन फ्यूल सेल में हवा की ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया करती है और बिजली बनाती है। यही बिजली ट्रेन के मोटर, एसी, लाइट और बाकी सिस्टम चलाती है।
इस पूरी प्रक्रिया में धुआँ नहीं निकलता। केवल पानी की भाप निकलती है। यानी पटरी पर चलते समय यह ट्रेन स्थानीय स्तर पर लगभग शून्य उत्सर्जन करती है।

बिजली वाली ट्रेनें पहले से हैं, फिर हाइड्रोजन क्यों?
यही सबसे दिलचस्प सवाल है। अगर किसी रेलमार्ग पर पहले से बिजली की लाइन मौजूद है, तो इलेक्ट्रिक ट्रेन आज भी हाइड्रोजन ट्रेन से ज़्यादा ऊर्जा दक्ष और सस्ती मानी जाती है।
फिर रेलवे हाइड्रोजन पर इतना निवेश क्यों कर रहा है?
क्योंकि इस ट्रेन की मंज़िल सिर्फ़ यात्रियों को एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन तक पहुँचाना नहीं है।
भारत हाइड्रोजन बनाना, उसे सुरक्षित तरीके से जमा करना, ट्रेन में भरना, फ्यूल सेल बनाना और इस पूरी तकनीक में आत्मनिर्भर होना चाहता है।
यानी यह ट्रेन एक पूरे हाइड्रोजन इकोसिस्टम की शुरुआत है।
क्या इससे रेल किराया सस्ता होगा?
फिलहाल इसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। एक हाइड्रोजन ट्रेन बनाने में लगभग 80 करोड़ रुपये तक का खर्च आ सकता है। इसके अलावा हाइड्रोजन बनाने, स्टोर करने और भरने का अलग इंफ्रास्ट्रक्चर भी बनाना पड़ता है।
आज के समय में ग्रीन हाइड्रोजन, बिजली या डीज़ल की तुलना में अभी महंगी है।
इसलिए आज की तारीख में यह परियोजना ‘किराया घटाने’ नहीं, बल्कि ‘भविष्य की लागत को predictable रखने’ और फॉसिल ईंधन पर निर्भरता घटाने की दिशा में उठाया गया कदम है।

किसे होगा फायदा?
- यात्रियों को कम शोर, साफ़ हवा और आधुनिक सफ़र का अनुभव मिलेगा।
- रेलवे को उन इलाकों के लिए एक विकल्प मिलेगा, जहाँ बिजली की लाइन बिछाना मुश्किल या बहुत महंगा है।
- सबसे बड़ा फायदा देश को होगा — 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य में हाइड्रोजन एक प्रमुख औजार बनेगा।
निष्कर्ष: पहली नज़र में यह सिर्फ़ एक नई ट्रेन लगती है। लेकिन असल में यह भारत की ऊर्जा व्यवस्था में एक बड़े बदलाव की तैयारी है। कई बार कोई ट्रेन सिर्फ़ यात्रियों को नहीं ले जाती — वह एक नई तकनीक, नया उद्योग और भविष्य की नई दिशा भी साथ लेकर चलती है।

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“निशांत जी जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर रिपोर्टिंग करते हैं। देश दुनिया में पर्यावरणीय मुद्दों, प्रदूषण, वन संरक्षण और जलवायु प्रभाव की ग्राउंड रिपोर्टिंग में विशेष रुचि रखते हैं।”
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