क्यों महिलाओं के कपड़ों में नहीं होती बड़ी पॉकेट? जानिए हैंडबैग का दिलचस्प इतिहास

History of Women's Handbags: आज शायद ही कोई महिला घर से पर्स/हैंडबैग के बिना निकलती है। ऑफिस जाना हो, शॉपिंग करनी हो या किसी समारोह में शामिल होना हो, हैंडबैग महिलाओं की जरूरत और स्टाइल दोनों का हिस्सा बन चुका है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर महिलाओं के कपड़ों में पॉकेट इतनी छोटी या कई बार नकली क्यों होती हैं? और क्यों महिलाओं को हर छोटी-बड़ी चीज के लिए बैग साथ रखना पड़ता है?

दिलचस्प बात यह है कि हैंडबैग की कहानी केवल फैशन की कहानी नहीं है, बल्कि यह महिलाओं की स्वतंत्रता, सामाजिक बदलाव और बदलती लाइफस्टाइल की भी कहानी है।

जब महिलाओं के पास थीं बड़ी-बड़ी छिपी जेबें

आज भले ही महिलाओं के कपड़ों में पॉकेट न हो, लेकिन कई सदियों पहले स्थिति बिल्कुल अलग थी। यूरोप और अमेरिका में महिलाएं अपनी स्कर्ट और पेटीकोट के नीचे कमर पर बड़ी-बड़ी कपड़े की पोटलियां बांधती थीं। 

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18वीं सदी में महिलाएं स्कर्ट के भीतर कमर पर छिपी कपड़े की जेबें पहनती थीं, जिनमें चाबियां, सिलाई का सामान, पैसे और रोजमर्रा की जरूरी चीजें सुरक्षित रखी जाती थीं।

इनमें महिलाएं पैसे, चाबियां, सिलाई का सामान, रुमाल और रोजमर्रा की कई जरूरी चीजें रख सकती थीं। खास बात यह थी कि ये जेबें कपड़ों के अंदर छिपी रहती थीं, इसलिए सामान सुरक्षित भी रहता था।

फैशन बदला और जेबें गायब हो गईं

18वीं सदी के अंत में फैशन की दुनिया में बड़ा बदलाव आया। महिलाओं के भारी-भरकम घेरदार कपड़ों की जगह पतले, शरीर से सटे और हल्के कपड़ों वाली ड्रेसेज पॉपुलर होने लगीं। ऐसे कपड़ों के नीचे बड़ी जेबें छिपाना संभव नहीं था। नतीजा यह हुआ कि महिलाओं के पॉकेट्स गायब होने लगे। 

छोटे बैग बने नया सहारा

पॉकेट की जगह महिलाओं ने छोटे ड्रॉ-स्ट्रिंग बैग इस्तेमाल करने शुरू किए, जिन्हें हाथ में या कलाई पर लटकाया जाता था। इन्हें "रेटिक्यूल" कहा जाता था।

हालांकि समाज ने इन बैगों को तुरंत स्वीकार नहीं किया। कई लोग इनका मजाक उड़ाते थे। पुरुषों के कपड़ों में उस समय जेबों की संख्या बढ़ रही थी, जबकि महिलाओं को छोटी-सी थैली में अपना सामान समेटना पड़ता था। इन छोटे बैगों की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इनमें ज्यादा सामान नहीं रखा जा सकता था। 

जब बैग बना महिलाओं का टूलकिट

विक्टोरियन युग में महिलाओं की जिम्मेदारियां काफी बढ़ चुकी थीं। बड़े घरों को मैनेज रना किसी कंपनी चलाने से कम नहीं था। ऐसे में उन्हें फिर से अपने जरूरी सामान को रखने की जरूरत महसूस हुई।

इसी दौर में "शैटेलाइन" पॉपुलर हुई, जो एक एक्सेसरी थी। यह कमर पर लगाई जाने वाली मेटल की एक खूबसूरत चेन होती थी, जिससे चाबियां, कैंची, घड़ी, नोटबुक और सिलाई का सामान लटकाया जा सकता था। इसे लटकाने वाले को घर का मुखिया माना जाता था। 

यात्रा और नौकरी ने बदली बैग की दुनिया

औद्योगिक क्रांति के बाद महिलाएं नौकरी करने लगीं, ट्रेन से यात्रा करने लगीं और लंबे समय तक घर से दूर रहने लगीं। ऐसे में महिलाओं को मजबूत और बड़े बैग की जरूरत थी। इसी समय लग्जरी ब्रांड्स ने लेदर और मेटल लॉक वाले बैग बनाना शुरू किया।

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महिलाओं के हैंडबैग का दिलचस्प सफर—छिपी हुई कमर की जेबों और छोटे रेटिक्यूल बैग से लेकर विक्टोरियन शैटेलाइन और आज के स्टाइलिश लेदर हैंडबैग तक, समय के साथ बदलती जरूरतों और आज़ादी की कहानी।

20वीं सदी की शुरुआत तक हैंडबैग महिलाओं की पहचान का हिस्सा बन चुका था। वे अपनी कमाई, पहचान पत्र, चाबियां और निजी सामान खुद संभालने लगीं। ऐसे में हैंडबैग केवल एक एक्सेसरी नहीं रहा, बल्कि महिलाओं की आजादी और कॉन्फिडेंस का प्रतीक बन गया।

आज भी जारी है पॉकेट पर बहस

आज भी कई महिलाएं कपड़ों में बड़ी पॉकेट्स की मांग करती हैं। सोशल मीडिया पर यह मुद्दा अक्सर चर्चा का विषय बनता है। इसके बावजूद पर्स का महत्व कम नहीं हुआ है।

दरअसल, पर्स एक अनोखा विरोधाभास है। यह एक फैशन एक्सेसरी की तरह है, लेकिन इसके अंदर महिलाओं की की जरूरतें, पहचान और आजादी छिपी है। यही वजह है कि पर्स का इतिहास सिर्फ फैशन का इतिहास नहीं, बल्कि महिलाओं के सशक्तिकरण की एक दिलचस्प यात्रा भी है।

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FAQ

Q.

महिलाएं हैंडबैग क्यों रखती हैं?

A.

यह जरूरत और फैशन दोनों का मिश्रण है।

Q.

रेटिक्यूल क्या है?

A.

यह पुराने समय में इस्तेमाल होने वाला एक छोटा हैंडबैग है।

Q.

महिलाओं के कपड़ों में जेब क्यों नहीं होती?

A.

फैशन ट्रेंड्स के कारण ऐतिहासिक रूप से महिलाओं के कपड़ों को 'स्लिम' लुक देने के लिए जेबें हटा दी गई थीं।

Q.

शैटेलाइन (Chatelaine) क्या है?

A.

यह कमर पर लटकने वाली चेन है जिसका उपयोग औजार और चाबियां रखने के लिए किया जाता था।

Q.

हैंडबैग आत्मनिर्भरता का प्रतीक कैसे है?

A.

यह महिला को अपनी जरूरत की चीजें खुद कैरी करने की शक्ति देता है।