अतिथि को देवता क्यों माना जाता है? जानिए क्या है शास्त्रों में छिपी 'अतिथि देवो भव' की धार्मिक मान्यता
अध्यात्म
अतिथि को देवता क्यों माना जाता है? जानिए क्या है शास्त्रों में छिपी 'अतिथि देवो भव' की धार्मिक मान्यता
- Authored by: विनीत
- Updated Jul 26, 2026, 04:27 PM IST
Atithi Devo Bhava Significance: क्या आपने कभी सोचा है भारतीय संस्कृति में अतिथि को देवता के समान सम्मान देने की परंपरा क्यों है? जानिए 'अतिथि देवो भव' का असली अर्थ, शास्त्रों में इसकी धार्मिक मान्यता।
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Atithi Devo Bhava
Atithi Devo Bhava Significance: भारतीय संस्कृति में बचपन से एक बात सुनने को मिलती है - 'अतिथि देवो भव।' यानी घर आए मेहमान को भगवान के समान सम्मान देना चाहिए। आज के समय में कई लोग इसे सिर्फ एक पुरानी परंपरा मानते हैं, लेकिन इसके पीछे गहरी धार्मिक सोच और जीवन का बड़ा संदेश छिपा है। हमारे वेद, उपनिषद और धर्मग्रंथ बताते हैं कि अतिथि का आदर करना केवल अच्छी आदत नहीं, बल्कि इंसान के अच्छे संस्कार और धर्म का हिस्सा भी है। यही वजह है कि हमारे यहां घर आए व्यक्ति का स्वागत मुस्कान, सम्मान और प्रेम से करने की सीख दी जाती है। आइए जानते हैं कि आखिर शास्त्रों में अतिथि को देवता के समान क्यों माना गया है।
'अतिथि देवो भव' का असली मतलब क्या है - Atithi devo bhava meaning
'अतिथि' उस व्यक्ति को कहा जाता है, जिसके आने की कोई तय तारीख न हो। यानी जो अचानक घर आ जाए। वहीं 'देवो भव' का मतलब है उसे देवता जैसा सम्मान देना। तैत्तिरीय उपनिषद में 'अतिथि देवो भव' का उल्लेख मिलता है। इसका संदेश यह नहीं है कि अतिथि सचमुच भगवान है, बल्कि यह है कि उसके साथ सम्मान, प्रेम और विनम्रता से व्यवहार करना चाहिए। यही भावना भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान मानी गई है।
शास्त्र अतिथि का सम्मान करने की सीख क्यों देते हैं
धर्मग्रंथों के अनुसार, घर आए अतिथि का आदर करना सेवा और दया का एक रूप है। माना जाता है कि जब कोई व्यक्ति आपके घर आता है, तो वह आपके अच्छे व्यवहार की परीक्षा भी होता है। इसलिए उसे बैठने की जगह देना, पानी पूछना, प्रेम से बात करना और अपनी क्षमता के अनुसार उसका सत्कार करना पुण्य का काम माना गया है। शास्त्र बताते हैं कि ऐसा करने से परिवार में सुख, शांति और अच्छे संस्कार बने रहते हैं।
अतिथि का सम्मान केवल धर्म नहीं अच्छे संस्कार भी
अतिथि सत्कार का मतलब केवल धार्मिक नियम निभाना नहीं है। यह इंसानियत और अच्छे व्यवहार की पहचान भी है। जब बच्चे अपने घर में बड़ों को मेहमानों का सम्मान करते हुए देखते हैं, तो वे भी दूसरों का आदर करना सीखते हैं। इससे परिवार में अपनापन बढ़ता है और समाज में एक-दूसरे के प्रति भरोसा मजबूत होता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में इस परंपरा को आज भी खास महत्व दिया जाता है।
क्या हर परिस्थिति में अतिथि का सम्मान करना जरूरी है
शास्त्र सम्मान के साथ-साथ समझदारी की भी बात करते हैं। अतिथि का आदर करना अच्छी बात है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अपनी सुरक्षा या परिवार की जिम्मेदारियों को नजरअंदाज कर दिया जाए। 'अतिथि देवो भव' का सही अर्थ है कि जो भी आपके घर आए, उसके साथ शालीनता, सम्मान और अच्छे व्यवहार से पेश आएं। दिखावे से नहीं, बल्कि सच्चे मन से किया गया सम्मान ही सबसे बड़ा सत्कार माना गया है।
आज भी क्यों जरूरी है 'अतिथि देवो भव'
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में भले ही लोगों के पास समय कम हो, लेकिन किसी का सम्मान करने के लिए बड़े इंतजाम की जरूरत नहीं होती। मीठे बोल, मुस्कान, एक गिलास पानी और अपनापन भी अतिथि सत्कार का हिस्सा हैं। 'अतिथि देवो भव' हमें यही सिखाता है कि रिश्ते सम्मान और प्रेम से मजबूत बनते हैं। यही सोच भारतीय संस्कृति को खास बनाती है और आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी सदियों पहले थी।
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विनीतauthor
विनीत टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में हेल्थ डेस्क के साथ बतौर चीफ कॉपी एडिटर जुड़े हैं। दिल्ली के रहने वाले विनीत को हेल्थ, फिटनेस और न्यूट्रिशन जैसे विषयों पर गहरी समझ है। इन्होंने हेल्थ, फिटनेस, न्यूट्रिशन और सप्लीमेंट के फील्ड में प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन भी किए हैं। वे 6 साल से इस फील्ड से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर 7,000 से अधिक लेख लिख चुके हैं। विनीत की खासियत उनकी रिसर्च-बेस्ड लेखन शैली और जनहित को ध्यान में रखते हुए लिखी गई जानकारीपूर्ण स्टोरीज हैं।
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