Radha Ashtami Vrat Katha: राधा रानी के जन्म की कथा
Radha Ashtami Vrat Katha: राधा अष्टमी भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि को मनाई जाती है. पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी तिथि में राधा रानी का जन्म वृषभानु और कीर्तिदा (कलावती) की पुत्री के रूप में हुआ था. महावीर और मिथिला पंचांग के अनुसार, इस साल भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि 19 सितंबर, शनिवार को पड़ रही है. पुराणों में राधा रानी के जन्म से जुड़ी कथा क्या है? जानिए.
राधा अष्टमी व्रत कथा
ब्रह्मवैवर्त और पद्म पुराण (पाताल खंड, गीता प्रेस गोरखपुर) में वर्णित प्रसंग के अनुसार, द्वापर युग में वृषभानु जी यमुना नदी में स्नान करने गए थे. उस दौरान दोपहर (मध्याह्न काल) के वक्त उन्हें जल में हजारों पत्ते वाले कमल पर सूर्य जैसा अलौकिक दिव्य तेज नजर आया. उस कमल के बीच एक तेजस्वी और अलौकिक रूप वाली एक कन्या मंद-मंद मुस्कुरा रही थी.
पद्म पुराण मे राधा रानी के जन्म का प्रमाण
"ततो दृष्ट्वा मया देवी बालभावेन संस्थिता, पद्ममध्ये स्थितां तन्वीं बालसूर्यसमप्रभाम्" (पद्म पुराण). यानी वृषभानु जी को कमल फूल के बीच सूर्य के समान चमकता हुआ और सुकोमल कन्या नजर आई.
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कैसे हुआ राधा रानी का प्राकट्य?
कहा जाता है कि वृषभानु जी और उनकी पत्नी कीर्तिदा (कलावती) को संतान नहीं थी. इसलिए वे उस कन्या को अपनी गोद में उठाकर रावल स्थित अपने महल में ले आए. पौराणिक मान्यता के अनुसार, राधा रानी का प्राकट्य श्रीकृष्ण से साढ़े ग्यारह महीने पहले हुआ था.
रावल (मथुरा में स्थित) में प्राकट्य के बाद राधा रानी ने अपनी आंखें नहीं खोलीं. इसे देखकर कीर्तिदा और वृषभानु जी चिंतित हो गए. उन्हें लगा कि कन्या आंखों से दिव्यांग है. कहा जाता है कि राधा रानी ने संकल्प लिया था कि जब तक वह श्रीकृष्ण का दर्शन नहीं कर लेंगी, तब तक अपनी आंखें नहीं खोलेंगी.
कुछ समय बीतने पर नंद जी की पत्नी यशोदा जी गोकुल से अपने लाडले (कान्हा जी) के साथ वृषभानु जी के घर पहुंचीं, जहां उनका आदर के साथ स्वागत किया गया. यशोदा जी कान्हा जी (श्रीकृष्ण) को अपनी गोद में लेकर राधा रानी के पास पहुंचीं. जब राधा रानी के सामने कान्हा जी पहुंचे, तो उन्होंने अपनी आंखें खोलीं. राधा रानी, कान्हा जी को एकटक (बिना पलक झपकाए) निहारती रहीं. अपने प्राणप्रिय कान्हा जी (श्रीकृष्ण) को देखकर राधा रानी बहुत आनंदित हुईं. वहीं, कान्हा जी भी राधा रानी को सामने देखकर बेहद खुश हुए.

कीर्दिता और वृषभानु जी ने पूर्व जन्म में की थी कठोर तपस्या
राधा रानी के जन्म से जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में एक दिन वृषभानु जी यमुना में स्नान करने गए. उस दौरान उन्हें यमुना में सोने सा चमकता हुआ एक कमल तैरता हुआ दिखाई दिया. वृषभानु जी उस कमल के पास गए, तो उन्हें कमल फूल की पंखुड़ियों के बीच एक सुंदर कन्या लेटी हुई अवस्था में दिखाई दी. उस वक्त ब्रह्मा अचानक वहां प्रकट हुए. उन्होंने कहा कि पिछले जन्म में वृषभानु और उनकी पत्नी कीर्तिदा ने भगवान विष्णु की पत्नी (लक्ष्मी) को संतान के रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की थी.
पूर्व जन्म के तप का फल: जब वृषभानु-कीर्तिदा के घर आईं राधा रानी
भगवान ब्रह्मा ने वृषभानु जी को बताया कि कमल के फूल पर विराजमान यह कन्या मां लक्ष्मी का प्रतिरूप है. इस घटना के बाद वृषभानु जी उस कन्या को अपने घर ले गए. शरद पूर्णिमा के चंद्रमा के समान चमकती हुई कन्या को देखकर कीर्तिदा (वृषभानु जी की पत्नी) की खुशी का ठिकाना न रहा.
घर में कन्या के आने पर कीर्तिदा ने धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया. ब्राह्मणों को गायें दान कीं. राधा रानी को रत्नों से जड़े पालने में रखा गया. धीरे-धीरे गांव की अन्य महिलाएं भी राधा रानी को देखने और पालने में झुलाने के लिए पहुंचने लगीं. राधा रानी का तेज चंद्रमा के समान धीरे-धीरे बढ़ता गया.
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