Raksha Bandhan Mythological Stories: सबसे पहले किसने बांधी थी राखी? जानिए रक्षाबंधन से जुड़ी 4 प्रसिद्ध पौराणिक व ऐतिहासिक कथाएं - Haribhoomi

सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन केवल एक धागे का त्योहार नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा धार्मिक और पौराणिक महत्व छिपा हुआ है। भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने और सुरक्षा का संकल्प लेने की यह परंपरा सदियों पुरानी है। सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथों में ऐसे कई प्रसंग मिलते हैं जहां रक्षा सूत्र ने न केवल संकटों से रक्षा की, बल्कि रिश्तों को अमर बना दिया। आइए जानते हैं रक्षाबंधन से जुड़ी चार प्रमुख पौराणिक कथाएं और एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक प्रसंग, जो इस पावन पर्व के महत्व को उजागर करते हैं।

Raksha Bandhan Pauranik Kathaein

रक्षाबंधन का यह त्यौहार केवल सगे रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समर्पण और विश्वास की डोर है।

  • Published: 28 Aug 2026, 06:37 AM IST
  • Last Updated: 28 Aug 2026, 06:38 AM IST

रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के अटूट विश्वास, असीम प्रेम और सुरक्षा के संकल्प का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। हर साल सावन पूर्णिमा के दिन बहनें अपने भाइयों की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि रक्षा सूत्र बांधने की यह परंपरा कब और कैसे शुरू हुई? पौराणिक मान्यताओं और धार्मिक ग्रंथों में देवताओं, महापुरुषों और ऐतिहासिक चरित्रों से जुड़ी कई कथाएं मिलती हैं, जो बताती हैं कि रक्षा का संबंध केवल सगे रिश्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समर्पण और विश्वास की डोर है।

​देवासुर संग्राम में इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर बांधा था रक्षा सूत्र 
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में जब देवताओं और असुरों के बीच भीषण युद्ध छिड़ा, तो असुरों का पलड़ा भारी होने लगा और देवराज इंद्र की स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई। देवताओं को संकट में देखकर इंद्राणी (शची) ने भगवान विष्णु की कठिन आराधना की।

इसके बाद उन्होंने मंत्रोच्चार से अभिमंत्रित करके एक दिव्य और पवित्र रक्षा सूत्र तैयार किया और उसे देवराज इंद्र की कलाई पर बांध दिया। इस रक्षा सूत्र के प्रभाव से इंद्र में अदम्य साहस और आत्मविश्वास का संचार हुआ और उन्होंने असुरों को पराजित कर स्वर्ग पर पुनः विजय प्राप्त की। तभी से संकट के समय रक्षा, विजय और सुरक्षा के लिए रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा शुरू हुई।

​यमुना के स्नेह से प्रसन्न हुए यमराज, दिया लंबी आयु का वरदान 
रक्षाबंधन से जुड़ा दूसरा अत्यंत पावन प्रसंग सूर्यपुत्री यमुना और मृत्यु के देवता यमराज से संबंधित है। पौराणिक कथा के अनुसार, देवी यमुना अपने भाई यमराज से मिलने के लिए लंबे समय से प्रतीक्षा कर रही थीं। जब यमराज उनके घर पहुंचे, तो यमुना ने बड़े आदर और प्रेम के साथ उनका स्वागत किया। यमुना ने विधिवत पूजा-अर्चना करने के बाद यमराज की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा।

अपनी बहन के निश्छल प्रेम और स्नेह से गदगद होकर यमराज ने वरदान दिया कि जो भी बहन सावन पूर्णिमा पर श्रद्धापूर्वक अपने भाई को रक्षा सूत्र बांधेगी, उसके भाई को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा और उसे दीर्घायु व सुख-समृद्धि की प्राप्ति होगी।

​भगवान विष्णु को वापस लाने के लिए माता लक्ष्मी ने बनाया राजा बलि को भाई 
एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने वामन अवतार में दानवीर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगकर उनका घमंड तोड़ा और बाद में बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें पाताल लोक में सदैव उनके साथ रहने का वचन दे दिया। जब काफी समय तक भगवान विष्णु बैकुंठ वापस नहीं लौटे, तो माता लक्ष्मी एक साधारण स्त्री का रूप धारण कर राजा बलि के पास पहुंचीं।

उन्होंने राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उन्हें अपना भाई बना लिया। जब बलि ने उनसे उपहार मांगने को कहा, तो माता लक्ष्मी ने अपने स्वामी भगवान विष्णु को मांग लिया। बहन के मान-सम्मान की रक्षा करते हुए राजा बलि ने खुशी-खुशी भगवान विष्णु को बैकुंठ जाने की अनुमति दे दी।

​द्रौपदी के स्नेह ने भगवान श्रीकृष्ण से जोड़ा रक्षा का अटूट बंधन 
महाभारत काल की सबसे लोकप्रिय कथा के अनुसार, शिशुपाल के वध के दौरान सुदर्शन चक्र के प्रभाव से भगवान श्रीकृष्ण की उंगली में गहरी चोट लग गई और रक्त बहने लगा। यह देखकर पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने बिना एक पल गंवाए अपनी कीमती रेशमी साड़ी का पल्लू फाड़कर कान्हा की उंगली पर बांध दिया। द्रौपदी के इस निःस्वार्थ समर्पण और स्नेह से भावुक होकर श्रीकृष्ण ने वचन दिया कि वे जीवन भर द्रौपदी के इस धागे का कर्ज चुकाएंगे और हर संकट में उनकी रक्षा करेंगे।

आगे चलकर जब कौरवों की भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया गया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने वचन को निभाते हुए द्रौपदी के चीर को बढ़ाकर उनकी लाज की रक्षा की।

​रानी कर्णावती और हुमायूं की ऐतिहासिक लोककथा 
पौराणिक कथाओं के अतिरिक्त इतिहास में चित्तौड़गढ़ की महारानी कर्णावती और मुगल शासक हुमायूं का प्रसंग भी अत्यंत चर्चित है। जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया, तब रानी कर्णावती ने अपने राज्य की सुरक्षा के लिए हुमायूं को राखी भेजकर सहायता की गुहार लगाई थी।

यद्यपि आधुनिक इतिहासकारों में इस प्रसंग के दस्तावेजी प्रमाणों को लेकर मतभेद हैं, लेकिन यह लोककथा यह संदेश जरूर देती है कि रक्षाबंधन का पावन धागा धर्म, जाति और सीमाओं से परे जाकर विश्वास और मानवीय सुरक्षा का प्रतीक बन जाता है।