SIR विवाद के बीच CEC-ECs नियुक्ति पर SC में सवाल, जस्टिस दत्ता बोले- जीतने वाली टीम का अंपायर हो तो शक रहेगा
Published: Wednesday, September 23, 2026, 21:21 [IST]
SIR Row 2026: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन(SIR) को लेकर चुनाव आयोग पर राजनीतिक घमासान बढ़ता ही जा रहा है। इस बीच, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार (23 सितंबर) को अहम सुनवाई हुई। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और उसकी नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए क्रिकेट का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अगर किसी मैच में जीतने वाली टीम का कप्तान ही अंपायर चुनता है, तो अंपायर के फैसले सही होने के बावजूद उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठने की गुंजाइश बनी रहेगी।
यह टिप्पणी उस कानून के संदर्भ में आई, जिसके तहत CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनी तीन सदस्यीय चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस व्यवस्था में सरकार के दो सदस्य होने से कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ जाता है।
पहले समझिए, विवाद किस कानून को लेकर है?
2023 के Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act की धारा 7 के मुताबिक, CEC (चीफ इलेक्शन कमीशनर)और ECs (इलेक्शन कमीशनर्स) की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, लेकिन इसके लिए सिफारिश तीन सदस्यीय चयन समिति करती है। इस समिति में...
- प्रधानमंत्री : अध्यक्ष
- लोकसभा में विपक्ष के नेता : सदस्य
- प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री : सदस्य शामिल होते हैं। यानी तीन सदस्यों वाली समिति में प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री, दोनों सरकार की ओर से होते हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे चयन प्रक्रिया में सरकार का प्रभाव बढ़ता है और चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है।
जस्टिस दत्ता ने अंपायर का उदाहरण क्यों दिया?
जस्टिस दत्ता ने कहा कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सिर्फ वास्तविक रूप से नहीं, बल्कि लोगों को दिखाई भी देनी चाहिए। उन्होंने समझाया कि अगर किसी क्रिकेट मैच में एक टीम का कप्तान अंपायर चुनता है और बाद में वही टीम मैच जीत जाती है, तो अंपायर के सही फैसलों पर भी सवाल उठ सकते हैं। वजह यह होगी कि अंपायर को चुनने वाला कप्तान ही जीतने वाली टीम का हिस्सा था।
इसी तर्क को चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि अगर चयन समिति में सरकार के दो सदस्य हैं, तो यह धारणा बन सकती है कि कार्यपालिका के पास प्रभावी वीटो है। जस्टिस दत्ता के मुताबिक, चयन प्रक्रिया में किसी फैसले को प्रभावित करने के लिए वास्तविक तौर पर वीटो इस्तेमाल होना जरूरी नहीं है। यह संभावना भी प्रक्रिया की निष्पक्षता की धारणा को प्रभावित कर सकती है।
'EC स्वतंत्र हो, लेकिन स्वतंत्र दिखे भी'
जस्टिस दत्ता ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए वास्तव में स्वतंत्र चुनाव आयोग जरूरी है। लेकिन केवल संस्था का स्वतंत्र होना पर्याप्त नहीं है, उसे जनता की नजर में भी स्वतंत्र दिखाई देना चाहिए। उन्होंने इस बात पर भी सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह चयन समिति में अपने ही प्रधानमंत्री के खिलाफ खड़ा होगा। उनके अनुसार, मंत्री के सामने प्रधानमंत्री के खिलाफ जाने की संभावना ही चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता की धारणा को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत का भी हवाला दिया।
2023 से पहले क्या व्यवस्था थी?
यह विवाद 2023 के एक महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट फैसले से भी जुड़ा है। Anoop Baranwal मामले में संविधान पीठ ने कहा था कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक CEC और ECs की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की सलाह पर की जाए। बाद में संसद ने 2023 का कानून बनाया और नई चयन समिति में CJI की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किया। यही बदलाव मौजूदा याचिकाओं में मुख्य संवैधानिक सवालों में से एक है।
SIR Row 2026:
मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की दो सदस्यीय पीठ ने की। दोनों न्यायाधीश इस सवाल पर अलग-अलग राय पर पहुंचे कि क्या इन याचिकाओं को बड़ी संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए।
जस्टिस दत्ता ने बड़ी पीठ को रेफर करने की मांग को स्वीकार नहीं किया, जबकि जस्टिस शर्मा का मानना था कि मामला संविधान पीठ के सामने जाना चाहिए। हालांकि, दोनों न्यायाधीश इस बात पर सहमत हुए कि मामले को CJI के पास भेजा जाए, ताकि उचित संख्या वाली संविधान पीठ गठित की जा सके और संवैधानिक सवालों पर अंतिम रूप से सुनवाई हो सके।
अब बड़ी संविधान पीठ के सामने क्या सवाल होंगे?
मामले में मुख्य सवाल यह है कि संसद को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत CEC और ECs की नियुक्ति की प्रक्रिया तय करने की कितनी स्वतंत्रता है और उस प्रक्रिया की संवैधानिक सीमाएं क्या हैं। इसके साथ यह भी जांचा जाना है कि 2023 के कानून में सरकार की भूमिका चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता की संवैधानिक आवश्यकता के अनुरूप है या नहीं। याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 14 और संविधान के बुनियादी ढांचे के सिद्धांतों का भी हवाला दिया है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का तर्क है कि संसद को नियुक्ति प्रक्रिया तय करने का अधिकार है और 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने जो व्यवस्था बनाई थी, वह संसद के कानून बनाने तक की अंतरिम व्यवस्था थी।