SIR in Delhi 2026: दिल्ली SIR में जिन 2 बातों को लेकर 33 लाख लोगों को मिला नोटिस, उसमें गलती किसकी है?

SIR in Delhi 2026: दिल्ली की वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर अब सवाल सिर्फ वोटर लिस्ट में नाम जुड़ने या कटने तक सीमित नहीं है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि करीब 33.13 लाख वोटर्स को नो मैपिंग और लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी यानी तार्किक विसंगति के आधार पर नोटिस क्यों भेजे गए और इस पूरी प्रक्रिया में गड़बड़ी कहां हुई? दरअसल, 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में 97,53,577 वोटर्स थे. इनमें 47,56,722 नाम Absent, Shifted, Dead or Duplicate यानी ASDD श्रेणी में ड्राफ्ट से बाहर रखे गए.

वहीं ड्राफ्ट में शामिल 33,12,919 वोटर्स को नोटिस के लिए चिन्हित किया गया. इनमें 13,79,785 वोटर्स नो मैपिंग और 19,33,134 लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी की श्रेणी में हैं. इसी मामले को लेकर अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी ने वकील प्रशांत भूषण के जरिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है. याचिका में इन वोटर्स के नाम और नोटिस की वजह सार्वजनिक करने के साथ लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के मानदंड, परिभाषा और इस्तेमाल किए गए एल्गोरिदम को सार्वजनिक करने की मांग की गई है. मामले की सुनवाई आज सुप्रीम कोर्ट में होनी है.

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दिल्ली SIR का पूरा गणित

पहले समझिए मैपिंग क्या है

SIR में मौजूदा वोटर के डिटेल को पिछली SIR वाली वोटर लिस्ट से मिलाया जाता है. यह काम BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) करता है. डेटा मैच कराने के लिए निर्वाचन आयोग के ऐप या वोटर सर्विस पोर्टल का इस्तेमाल किया जाता है.

  • सेल्फ मैपिंग (Self Mapping): अगर वोटर का नाम पिछली SIR की वोटर लिस्ट में मौजूद है, तो ताजा डिटेल को सीधे पुराने रिकॉर्ड से जोड़ दिया जाता है.
  • प्रोजनी मैपिंग (Progeny Mapping): अगर वोटर उस समय 18 साल से कम उम्र का था या उसका नाम पुरानी लिस्ट में नहीं है, तो उसके माता-पिता या दादा-दादी के नाम से लिंक यानी मैपिंग करने की कोशिश की जाती. ऐसा न होने पर सिस्टम वोटर को अनमैप्ड फ्लैग कर देता है.

लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी क्या है?

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लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी क्या है?

इसका मतलब वोटर के मौजूदा रिकॉर्ड और पुराने रिकॉर्ड में ऐसी जानकारी का मेल न खाना है, जिसे सिस्टम जांच के लिए फ्लैग करता है. इसमें पिता के नाम की स्पेलिंग या नाम में अंतर, वोटर और माता-पिता की उम्र में 15 साल से कम या 50 साल से ज्यादा का अंतर, एक ही पिता के नाम से छह से ज्यादा वोटर दर्ज होना, वोटर और दादा-दादी या नाना-नानी की उम्र में 40 साल से कम का अंतर, जेंडर संबंधी जानकारी में असंगति और 45 साल से अधिक उम्र में पहली बार वोटर के तौर पर नाम दर्ज होना जैसी स्थितियां शामिल हैं.

यानी लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी अपने आप में किसी व्यक्ति के फर्जी वोटर होने का प्रमाण नहीं है. यह सिस्टम की ओर से आगे जांच के लिए लगाया गया एक फ्लैग है. दिल्ली में नोटिस पाने वालों में कई बड़े नाम भी शामिल हैं. पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री एस जयशंकर, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और चुनाव आयुक्त एसएस संधू समेत कई प्रमुख लोगों के रिकॉर्ड में भी ऐसी विसंगतियां या मैपिंग की समस्या सामने आई.

फिर गलती कहां हो रही है?

पूर्व IAS अधिकारी KBS सिद्धू ने इस प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि 33 लाख वोटर्स को या तो पुराने SIR रिकॉर्ड से मैप नहीं किया जा सका या चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ने उनके रिकॉर्ड में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी फ्लैग कर दी. सिद्धू के मुताबिक, यह संभव है कि पुराने रिकॉर्ड की गुणवत्ता, नामों की अलग-अलग स्पेलिंग, उम्र या पारिवारिक संबंधों की पुरानी एंट्री और आज के रिकॉर्ड के बीच अंतर की वजह से बड़ी संख्या में सामान्य वोटर्स भी सिस्टम में फ्लैग हो जाएं.

उन्होंने आडवाणी के परिवार का उदाहरण देते हुए लिखा कि एक ही परिवार और एक ही पते के कुछ सदस्यों का रिकॉर्ड मैप नहीं हुआ, जबकि उनके बेटे का रिकॉर्ड मैप हो गया. TV9 भारतवर्ष से बातचीत में सिद्धू ने इस प्रक्रिया को लेकर अपनी आलोचना भी रखी थी. उनके मुताबिक, समस्या यह है कि अगर किसी पुराने रिकॉर्ड से मौजूदा वोटर का लिंक नहीं बन पा रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि वोटर की पात्रता ही संदिग्ध हो गई.

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दिल्ली के जगनपुरा विधानसभा क्षेत्र के दरियागंज इलाके में इन लोगों को कारण के साथ नोटिस दिया गया है, हालांकि कुछ मामलों में वजह नहीं बताई गई है. सोर्स- https://www.ceodelhi.gov.in/

इधर, चुनाव आयोग का कहना है कि सिस्टम ने जिन रिकॉर्ड में विसंगति पाई, वहां नोटिस देकर वोटर से तथ्य और दस्तावेज सत्यापित कराए जा रहे हैं. उदाहरण के लिए दिल्ली चुनाव आयोग की वेबसाइट पर नोटिस मिलने वालों लोगों के नाम विसंगति के कारण के साथ जारी किए गए हैं. हालांकि कई नामों के आगे कारण नहीं दिए गए हैं. यानी अभी हर मामले में यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि गलती वोटर की है या डेटा सिस्टम की.

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वोटरों के लिए क्या है पूरी प्रकिया. ERO यानी इलेक्ट्रोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर.

मशीन और एल्गोरिदम का क्या रोल है?

इस पूरी प्रक्रिया में तकनीक की भूमिका अहम है. चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर/सिस्टम में मौजूदा वोटर के डिटेल को पिछले SIR के रिकॉर्ड से जोड़ने यानी मैपिंग की जाती है. जहां लिंक नहीं बनता, उसे अनमैप्ड के तौर पर चिन्हित किया जा सकता है. इसी तरह नाम, उम्र, माता-पिता की जानकारी और दूसरे रिकॉर्ड में अंतर मिलने पर सिस्टम लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी फ्लैग करता है.

यानी मशीन खुद यह फैसला नहीं कर रही कि कोई व्यक्ति वोटर है या नहीं. मशीन का काम रिकॉर्ड में समस्या पहचानना है. इसके बाद नोटिस, दस्तावेजों की जांच और सुनवाई की प्रक्रिया आती है. दिल्ली CEO कार्यालय ने भी कहा है कि ऐसे नोटिस सिस्टम जेनरेटेड हैं और इनका उद्देश्य ECINET में डेटा को सही करना है.

यहीं इस विवाद की सबसे बड़ी वजह है. अगर एल्गोरिदम पुराने या अधूरे रिकॉर्ड को आधार बनाकर किसी सही वोटर को फ्लैग कर देता है, तो क्या सिस्टम में उस गलती को पकड़ने और सुधारने के लिए कोई तरीका है? इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वाले लोगों ने लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के लिए इस्तेमाल किए गए मानकों और तकनीकी प्रक्रिया को सार्वजनिक करने की मांग की है.

कपिल सिब्बल ने क्या कहा?

राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल को भी उनकी पत्नी के साथ Unmapped with last SIR श्रेणी में नोटिस मिला है. सिब्बल ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया की आलोचना करते हुए इसे Special Intensive Deletion बताया और आरोप लगाया कि वैध वोटरों को हटाने और अवैध वोटरों को जोड़ने की दिशा में प्रक्रिया चल रही है. हालांकि चुनाव आयोग ने इन आरोपों से इनकार किया है. सिब्बल ने सवाल उठाया कि अगर उनका रिकॉर्ड पुराने 1998 के वोटर रिकॉर्ड से मेल खाता है, तो उन्हें 2002 के SIR से अनमैप्ड क्यों बताया गया.

चुनाव आयुक्त एसएस संधू को भी नोटिस क्यों मिला?

चुनाव आयुक्त एसएस संधू का नाम भी विसंगति वाले रिकॉर्ड में आया. उनके मामले में फॉर्म पर नाम Dr S S Sandhu, जबकि वोटर लिस्ट में Sukhbir Singh Sandhu दर्ज था. स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच के बाद उनकी एंट्री को सत्यापित कर दिया है और उसे अंतिम वोटर लिस्ट में शामिल करने के लिए वैध माना गया है. यानी नोटिस का मतलब यह नहीं है कि वोटर को फर्जी या अपात्र घोषित कर दिया गया है. नाम में मामूली अंतर भी सिस्टम में फ्लैग पैदा कर सकता है, जिसके बाद अधिकारी दस्तावेज देखकर रिकॉर्ड को सत्यापित कर सकते हैं.

नोटिस मिला तो क्या नाम वोटर लिस्ट से हट गया?

नहीं. यह सबसे जरूरी बात है. दिल्ली CEO कार्यालय ने साफ किया है कि नोटिस मिलने का मतलब वोटर का नाम वोटर लिस्ट से हट जाना नहीं है. संबंधित वोटर ERO (इलेक्ट्रोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) या BLO के सामने अपना जवाब और जरूरी दस्तावेज जमा कर सकता है. नोटिस का निपटारा 29 अक्टूबर 2026 तक किया जाना है और अंतिम वोटर लिस्ट 4 नवंबर 2026 को पब्लिश होनी है.

यानी अभी सवाल यह नहीं है कि 33 लाख वोटर्स के नाम कट गए हैं. असली सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में रिकॉर्ड फ्लैग होने की वजह क्या है, एल्गोरिदम के मानक कितने पारदर्शी हैं और हर सही वोटर को अपनी स्थिति साबित करने के लिए पर्याप्त मौका कैसे मिलेगा. एक तरफ चुनाव आयोग इसे रिकॉर्ड की जांच और सुधार की प्रक्रिया बता रहा है, दूसरी तरफ याचिकाकर्ता और KBS सिद्धू जैसे आलोचक सिस्टम की पारदर्शिता और पुराने डेटा पर निर्भरता पर सवाल उठा रहे हैं. अब देखना यह है सुप्रीम कोर्ट इस पर क्या फैसला लेता है.

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शुभेंदु प्रताप भूमंडल

शुभेंदु प्रताप भूमंडल

पत्रकारिता में बीते 5 साल से सक्रिय हैं. नेशनल और इंटरनेशनल न्यूज राइटिंग का अनुभव. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से साइंस में ग्रेजुएशन, फिर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और वीडियो प्रोडक्शन की पढ़ाई. दैनिक भास्कर डिजिटल से करियर की शुरुआत. बतौर न्यूज ब्रीफ एडिटर भास्कर डिजिटल में 800 से ज्यादा बाइलाइन स्टोरी. वीडियो स्क्रिप्टिंग का भी अनुभव. अगस्त 2025 से टीवी9 डिजिटल के साथ नई पारी का आगाज.

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