हर हफ्ते Space से गिर रहा 1 टन मलबा! क्या धरती पर मंडरा रहा है नया खतरा?

Space Junk Falling To Earth: क्या अंतरिक्ष का कचरा अब धरती के लिए खतरा बनता जा रहा है? रिपोर्ट के अनुसार हर सप्ताह करीब 1 मीट्रिक टन स्पेस डेब्रिस पृथ्वी पर लौट रहा है। जानिए यह मलबा कहां से आता है, कौन सा देश सबसे ज्यादा स्पेस कचरा फैला रहा है और इससे कितना खतरा है।

धरती से अंतरिक्ष तक इंसान की पहुंच लगातार बढ़ रही है। हर साल सैकड़ों नए सैटेलाइट लॉन्च हो रहे हैं और अंतरिक्ष मिशनों पर अरबों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन इस प्रगति के साथ एक नई चुनौती भी तेजी से सामने आ रही है, स्पेस डेब्रिस यानी अंतरिक्ष का कचरा। अब यह सिर्फ अंतरिक्ष में तैरने वाली समस्या नहीं रह गई है, बल्कि इसका असर धरती पर भी दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का दावा है कि अब लगभग हर सप्ताह एक मीट्रिक टन अंतरिक्ष मलबा पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर यह कचरा आता कहां से है और क्या भविष्य में यह इंसानों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है?

हर हफ्ते धरती पर गिर रहा है एक मीट्रिक टन अंतरिक्ष मलबा

पोलैंड की स्पेस एजेंसी के विशेषज्ञ मारियस स्लोनिना के अनुसार, अंतरिक्ष में जमा मलबे का एक हिस्सा लगातार पृथ्वी की ओर लौट रहा है। इस खतरे की चर्चा तब तेज हुई जब साल की शुरुआत में केन्या में अंतरिक्षयान की धातु की एक बड़ी रिंग जमीन पर गिरी।

रिपोर्टों के अनुसार, अधिकांश स्पेस डेब्रिस पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय जलकर नष्ट हो जाता है या समुद्र में गिर जाता है। लेकिन बड़ी और भारी वस्तुएं कई बार पूरी तरह नष्ट नहीं हो पातीं। अमेरिकी स्पेस फोर्स के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में वायुमंडल में प्रवेश करने वाली करीब 820 वस्तुओं के लिए अलर्ट जारी किया गया, जबकि लगभग एक दशक पहले यह संख्या केवल 110 थी। इससे साफ है कि अंतरिक्ष गतिविधियों में तेजी के साथ जोखिम भी बढ़ रहा है।

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आखिर अंतरिक्ष में इतना कचरा आता कहां से है?

स्पेस डेब्रिस उन सभी मानव-निर्मित वस्तुओं को कहा जाता है जो पृथ्वी की कक्षा में मौजूद हैं, लेकिन अब किसी मिशन या वैज्ञानिक उद्देश्य के लिए उपयोगी नहीं हैं।

इसमें सबसे पहले ऐसे सैटेलाइट शामिल हैं जिनकी उम्र पूरी हो चुकी है या जो तकनीकी रूप से खराब हो चुके हैं। इसके अलावा रॉकेट लॉन्च के बाद अलग हुए बूस्टर और उनके हिस्से भी अंतरिक्ष में तैरते रहते हैं।

जब दो उपग्रह या मलबे के टुकड़े आपस में टकराते हैं, तो हजारों नए छोटे-छोटे टुकड़े बन जाते हैं। कई देशों द्वारा किए गए एंटी-सैटेलाइट (ASAT) परीक्षण भी बड़ी मात्रा में स्पेस कचरा पैदा करते हैं। इतना ही नहीं, अंतरिक्ष यात्रियों के छूटे औजार, पेंट के सूक्ष्म कण और रॉकेट ईंधन की बूंदें भी इस कचरे का हिस्सा मानी जाती हैं।

सबसे ज्यादा स्पेस कचरा किस देश ने फैलाया?

उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, अंतरिक्ष में सबसे अधिक मलबा रूस से जुड़ा माना जाता है। इसके बाद अमेरिका, चीन, फ्रांस और जापान का नाम आता है।

रूस के शीर्ष पर होने का एक बड़ा कारण उसका लंबा अंतरिक्ष कार्यक्रम और वर्ष 2021 में किया गया एंटी-सैटेलाइट परीक्षण माना जाता है। उस परीक्षण में रूस ने अपने ही पुराने उपग्रह को मिसाइल से नष्ट कर दिया था, जिससे हजारों टुकड़े पृथ्वी की कक्षा में फैल गए। उस समय अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई गई थी।

25 हजार किमी प्रति घंटे की रफ्तार से घूमता है स्पेस डेब्रिस

विशेषज्ञों के मुताबिक, अंतरिक्ष का मलबा 25,000 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की रफ्तार से पृथ्वी की कक्षा में घूम सकता है। इतनी तेज गति पर एक छोटा-सा धातु का टुकड़ा भी किसी सक्रिय सैटेलाइट या अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।

इसी खतरे को देखते हुए NASA, ESA और ISRO जैसी अंतरिक्ष एजेंसियां डेब्रिस ट्रैकिंग सिस्टम, डी-ऑर्बिटिंग तकनीक और स्पेस क्लीनअप मिशनों पर काम कर रही हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य पुराने उपग्रहों को नियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल में जलाना या उन्हें सुरक्षित "ग्रेवयार्ड ऑर्बिट" में भेजना है।

दुनिया के कई देशों में गिर चुका है अंतरिक्ष का मलबा

हाल के वर्षों में अंतरिक्ष मलबे के कई मामले सामने आए हैं। इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का एक हिस्सा अमेरिका के फ्लोरिडा में एक घर पर गिर चुका है। वहीं स्पेसएक्स के रॉकेट के टुकड़े पोलैंड और कनाडा में मिले। ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस के समुद्री तटों पर भी अंतरिक्ष मलबा बहकर पहुंच चुका है, जबकि केन्या में रॉकेट का बड़ा हिस्सा खेत में गिरने की घटना ने इस खतरे को फिर चर्चा में ला दिया।

हालांकि अभी तक अधिकांश घटनाओं में बड़ा मानवीय नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन अंतरिक्ष में बढ़ती गतिविधियों के साथ स्पेस डेब्रिस वैश्विक चिंता का विषय बनता जा रहा है। आने वाले वर्षों में सुरक्षित अंतरिक्ष संचालन के लिए दुनिया भर की एजेंसियों को मिलकर इस चुनौती का समाधान तलाशना होगा।

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