Tata Sons को NBFC के दायरे से क्यों बाहर निकालने की तैयारी? Trusts के पुनर्गठन प्रस्ताव के पीछे क्या वजह?

Time Published: Monday, September 28, 2026, 21:00 [IST]

Tata Sons Restructuring: टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड (TSPL) के भविष्य को लेकर टाटा ट्रस्ट्स ने बड़ा प्रस्ताव रखा है। ट्रस्ट्स ने कंपनी के पुनर्गठन की योजना पेश की है। इसका मकसद टाटा संस को गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) की श्रेणी से बाहर लाना है।

इस प्रस्ताव के लागू होने के बाद पुनर्गठित टाटा संस को RBI के NBFC से जुड़े नियमों के दायरे में नहीं रहना होगा। इसका एक अहम असर यह होगा कि कंपनी के अनिवार्य सार्वजनिक लिस्टिंग के लिए दबाव भी खत्म हो सकता है।

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क्या है पूरा मामला?

टाटा संस लंबे समय से टाटा समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है। टाटा ट्रस्ट्स के पास इसमें करीब 65.9% हिस्सेदारी है। कंपनी की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग को लेकर टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के बीच मतभेद सामने आए हैं। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा कथित तौर पर टाटा संस की अनिवार्य लिस्टिंग के पक्ष में नहीं हैं। ऐसे में ट्रस्ट्स ने कंपनी के कारोबारी ढांचे में बदलाव का प्रस्ताव रखा है। इस पुनर्गठन का मुख्य उद्देश्य टाटा संस को इस तरह से संरचित करना है कि वह न तो NBFC रहे और न ही CIC।

कैसे बदलेगा टाटा संस का ढांचा?

प्रस्तावित योजना के तहत Tata Electronics Systems Solutions Private Limited (TESS) और Tata Consulting Engineers (TCE) का टाटा संस में विलय किया जाना है। इससे पुनर्गठित कंपनी के पास अपने ऑपरेशनल बिजनेस और खुद का राजस्व होगा। यानी टाटा संस सिर्फ टाटा समूह की कंपनियों में हिस्सेदारी रखने वाली होल्डिंग कंपनी नहीं रहेगी, बल्कि उसके पास प्रत्यक्ष कारोबारी गतिविधियां भी होंगी।

टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि यह मॉडल टाटा संस के पुराने कारोबारी ढांचे के अनुरूप है। ट्रस्ट्स के मुताबिक, अपने करीब 100 साल के इतिहास में लगभग 80 वर्षों तक टाटा संस के पास खुद का परिचालन कारोबार और उससे होने वाला राजस्व रहा है।

लिस्टिंग से क्या है कनेक्शन?

टाटा संस को NBFC के रूप में RBI के साथ पंजीकृत किया गया था। बाद में कंपनी को CIC के रूप में भी वर्गीकृत किया गया। RBI के नियमों के तहत इस श्रेणी की बड़ी कंपनियों पर लिस्टिंग से जुड़े प्रावधान लागू होते हैं। हाल ही में RBI ने टाटा संस का NBFC के रूप में पंजीकरण खत्म करने के आवेदन को खारिज कर दिया था। इसके बाद कंपनी के लिए लिस्टिंग का मुद्दा फिर महत्वपूर्ण हो गया। अब अगर पुनर्गठन के जरिए टाटा संस को NBFC और CIC की श्रेणी से बाहर किया जाता है, तो कंपनी पर इन श्रेणियों से जुड़े RBI नियम लागू नहीं होंगे। इससे अनिवार्य लिस्टिंग का आधार भी खत्म हो सकता है।

टाटा ट्रस्ट्स ने क्या तर्क दिया?

टाटा ट्रस्ट्स का कहना है कि प्रस्तावित पुनर्गठन टाटा संस को उसके पुराने ऑपरेटिंग मॉडल की ओर ले जाएगा। इसमें कंपनी एक तरफ टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी की भूमिका निभाएगी, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने कारोबार और राजस्व के स्रोत भी होंगे। ट्रस्ट्स ने इसे टाटा संस के पुराने कारोबारी ढांचे और 2004 के बाद RBI की ओर से कंपनी को गैर-बैंकिंग, गैर-वित्तीय कंपनी के तौर पर किए गए वर्गीकरण के अनुरूप बताया है।

टाटा संस की लिस्टिंग पर क्यों है विवाद?

टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर कंपनी के बोर्ड और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेद हाल के दिनों में सामने आए हैं। 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में कंपनी की लिस्टिंग को लेकर चर्चा हुई। रिपोर्टों के मुताबिक, नोएल टाटा ने इसका विरोध किया और कहा कि दिवंगत रतन टाटा के नेतृत्व में टाटा संस के बोर्ड ने कंपनी को सूचीबद्ध नहीं करने का फैसला लिया था। इसी बैठक में कंपनी के पुनर्गठन का सुझाव भी सामने आया। प्रस्ताव का उद्देश्य टाटा संस को अलग-अलग कारोबारी इकाइयों के साथ पुनर्गठित करना बताया गया, जिससे कंपनी की संरचना बदले और लिस्टिंग से जुड़ा मुद्दा भी प्रभावित हो।

चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति पर भी मतभेद

टाटा संस के भीतर मतभेद का एक अन्य मुद्दा एन. चंद्रशेखरन की टाटा समूह के कार्यकारी चेयरमैन के तौर पर पुनर्नियुक्ति से जुड़ा है। रिपोर्टों के मुताबिक, बोर्ड ने उनकी पुनर्नियुक्ति का सर्वसम्मति से समर्थन किया था। हालांकि, नोएल टाटा ने इस फैसले पर आपत्ति जताई और इसे कानूनी रूप से अमान्य बताया। वे इस फैसले के खिलाफ वोट करने वाले बोर्ड के एकमात्र सदस्य बताए गए।

अब आगे क्या होगा?

टाटा ट्रस्ट्स का पुनर्गठन प्रस्ताव अभी प्रक्रिया का हिस्सा है। प्रस्तावित विलय और कारोबारी ढांचे में बदलाव के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि टाटा संस की नियामकीय स्थिति किस तरह बदलती है। फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में तीन अहम मुद्दे हैं। टाटा संस का पुनर्गठन, RBI के NBFC/CIC नियमों से बाहर निकलना और कंपनी की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग।