Tibet Earthquake: भूकंप के झटकों से थर्राया तिब्बत, 5.3 की तीव्रता से हिली धरती

Tibet Earthquake: तिब्बत में 5.3 तीव्रता के जोरदार भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं. भूकंप का असर नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में भी दिखा. कुछ दिन पहले ही यहां ग्लेशियर फटने से भीषण बाढ़ आई थी.

Tibet Earthquake: तिब्बत में 5.3 तीव्रता के जोरदार भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं. भूकंप का असर नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में भी दिखा. कुछ दिन पहले ही यहां ग्लेशियर फटने से भीषण बाढ़ आई थी.

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Tibet Earthquake Photograph: (NN)

Tibet Earthquake: हिमालय की गोद में बसे तिब्बत और नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में प्रकृति का मिजाज लगातार खतरनाक बना हुआ है. अभी लोग कुछ दिन पहले आई विनाशकारी बाढ़ और तबाही के सदमे से उबर भी नहीं पाए थे कि अब जमीन के भीतर से उठी हलचल ने लोगों को दहशत में डाल दिया है. बुधवार को तिब्बत के भूभाग में 5.3 तीव्रता का तेज भूकंप दर्ज किया गया. इस झटके का असर केवल तिब्बत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीमा पार नेपाल के कई रिहायशी इलाकों में भी धरती हिलने से अफरा तफरी मच गई.

धरती के भीतर 35 किलोमीटर पर हलचल

यूरोपियन मेडिटेरेनियन सिस्मोलॉजिकल सेंटर की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, बुधवार को आए इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 5.3 मापी गई है. एजेंसी ने अपनी पड़ताल में स्पष्ट किया है कि भूकंप का केंद्र जमीन की सतह से लगभग 35 किलोमीटर नीचे मौजूद था. गहराई अधिक होने के कारण झटके का असर काफी बड़े दायरे में फैला और नेपाल के कई सीमावर्ती हिस्सों में मकान हिलने लगे. अचानक आए इस झटके के बाद लोग अपने घरों से बाहर निकल आए. गनीमत यह रही कि स्थानीय प्रशासन या आपदा प्रबंधन दलों की ओर से फिलहाल किसी तरह की जनहानि या बड़ी इमारतों के ढहने की सूचना नहीं मिली है.

एक ही हफ्ते में दूसरी बार कांपी जमीन

इस पूरे हिमालयी क्षेत्र में भूगर्भीय हलचलें अचानक बहुत तेज हो गई हैं. बुधवार का यह झटका कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि पिछले कुछ दिनों में यह दूसरी बड़ी हलचल है. इससे पहले जर्मन रिसर्च सेंटर फॉर जियोसाइंसेज ने जानकारी दी थी कि पिछले गुरुवार को भी तिब्बत की धरती इसी तरह हिली थी. उस समय भूकंप की तीव्रता 5 मापी गई थी और उसका केंद्र जमीन में केवल 10 किलोमीटर की गहराई पर स्थित था. कम गहराई पर आने वाले झटके सतह पर ज्यादा कंपन पैदा करते हैं. एक ही हफ्ते के अंतराल में लगातार दो बार जमीन हिलने से स्थानीय नागरिकों के मन में डर पूरी तरह बैठ गया है.

ग्लेशियर टूटने से मची थी भारी तबाही

यह नया भूकंप ऐसे संवेदनशील समय पर आया है जब इलाका पहले से ही एक बहुत बड़ी प्राकृतिक आपदा के घावों को सहला रहा है. बीते 26 अगस्त को तिब्बत और नेपाल के सीमावर्ती ऊंचे पहाड़ों पर एक विशाल ग्लेशियर अचानक टूट गया था. ग्लेशियर के टूटने से भारी मात्रा में पानी, जमा हुआ कीचड़ और बड़े बड़े बोल्डर सैलाब बनकर नीचे की ओर बह निकले थे. इस जलजले ने नेपाल के रसुवा जिले के साथ साथ तिब्बत के निचले इलाकों में भारी तबाही मचाई थी. कई बस्तियां मलबे के ढेर में तब्दील हो गई थीं. सड़कें टूट चुकी थीं और कई पुल पानी के तेज बहाव में बह गए थे.

पनबिजली ढांचों को गहरा आघात

उस भीषण जलप्रलय की सबसे बड़ी चोट इलाके के बुनियादी ढांचे पर पड़ी थी. तेज बहाव और मलबे की चपेट में आने से कम से कम 11 महत्वपूर्ण पनबिजली परियोजनाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई थीं. पानी के साथ आए भारी पत्थरों ने बिजली घरों की मशीनों और निर्माण को भारी नुकसान पहुंचाया था. हालात इतने गंभीर हो गए थे कि कई परियोजनाओं की सुरंगों में काम कर रहे मजदूरों के फंसने की आशंका पैदा हो गई थी. राहत और बचाव दल अभी भी मलबे को हटाने और सुरंगों के भीतर लोगों की तलाश करने के बेहद कठिन काम में जुटे हुए हैं. इस बीच नए भूकंप ने इन बचाव अभियानों के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.

बर्फ खिसकने से बढ़ा था नदी का बहाव

विशेषज्ञों का कहना है कि 26 अगस्त को पैदा हुआ संकट दरअसल सीमावर्ती ढलानों पर बड़े पैमाने पर हिमस्खलन और चट्टानों के अचानक खिसकने से शुरू हुआ था. पहाड़ों का एक बड़ा हिस्सा टूटकर सीधे भोतेकोशी नदी में जा गिरा था, जिससे नदी का प्राकृतिक रास्ता कुछ देर के लिए रुक गया और फिर पानी पूरे वेग के साथ निचले इलाकों की तरफ बढ़ा. पानी के इस बेकाबू बहाव ने उत्तरी और मध्य नेपाल के बड़े इलाके को जलमग्न कर दिया था. रास्ते में आने वाले घर, छोटी दुकानें और खेत पूरी तरह बर्बाद हो गए थे.

नाज़ुक पर्यावरण पर मंडराता खतरा

इस पूरी शृंखला ने किंघाई तिब्बत पठार की पर्यावरणीय सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. चीन के जलवायु वैज्ञानिकों का स्पष्ट मानना है कि वैश्विक स्तर पर बढ़ता तापमान पहाड़ों के लिए अभिशाप बन रहा है. तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी की वजह से सदियों पुराने ग्लेशियर बहुत तेजी से पिघल रहे हैं और पीछे खिसक रहे हैं. इस बदलाव से पहाड़ों की बनावट कमजोर पड़ रही है, जिससे कभी ग्लेशियर टूटने का खतरा बनता है तो कभी पहाड़ों में भूस्खलन होने लगता है. मौसम का यह असंतुलन हिमालय की ऊंची चोटियों से लेकर घाटियों में रहने वाले आम लोगों तक के लिए एक बड़ा संकट बनता जा रहा है. लगातार आते भूकंप और मौसम के बदलते मिजाज ने पूरे क्षेत्र को खतरे के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है.

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