क्या J&K-लद्दाख पर भारत पीछे हटा? UN के नए नक्शे में दुनिया कितनी अलग

अमेरिका के न्यूयॉर्क में यूनाइटेड नेशंस (UN) महासभा का हॉल गूंज उठा क्योंकि 164 देशों ने हाथ उठाकर ऐतिहासिक प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी. अब 500 साल से स्कूलों, किताबों, न्यूजरूम और दफ्तरों में दिखने वाला दुनिया का नक्शा बदल रहा है. इसमें 6 देशों ने वोटिंग से किनारा कर लिया, जबकि सिर्फ अमेरिका विरोध में अकेला खड़ा रहा. भारत ने 164 देशों के साथ 'हां' कहा, लेकिन 48 घंटों में बड़ी चेतावनी दे दी. आखिर भारत ने समर्थन देकर हाथ क्यों खींच लिए और क्या नक्शा बदलने से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख बदल जाएगा...

दुनिया का नक्शा बदलने का पूरा मामला क्या है?

4 सितंबर 2026 को UN ने दुनिया के नक्शे को बनाने के तरीके को बदलने का फैसला किया है. अब तक दुनिया में 'मर्केटर प्रोजेक्शन' नाम का नक्शा इस्तेमाल होता था. इसे 1569 में बनाया गया था. इस नक्शे की सबसे बड़ी खामी यह है कि यह अफ्रीका को बहुत छोटा दिखाता है, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका को बहुत बड़ा. असल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से 14 गुना बड़ा है, लेकिन पुराने नक्शे में दोनों एक जैसे दिखते हैं.

UN ने अब 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' को अपनाने का फैसला किया है, जो 2018 में विकसित किया गया था. यह नया नक्शा महाद्वीपों को उनके मौजूदा आकार के करीब दिखाता है. इसमें अफ्रीका बड़ा दिखेगा, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका छोटे.


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UN महासभा की वोटिंग में क्या हुआ?

यह प्रस्ताव अफ्रीकी देश टोगो ने पेश किया था और अफ्रीकी संघ ने इसका समर्थन किया था. UN महासभा में हुई वोटिंग में:

  • 164 देशों ने इसके पक्ष में वोट किया.
  • एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन ने वोटिंग से परहेज किया.
  • सिर्फ अमेरिका ने इसके खिलाफ वोट किया.

नए नक्शे का समर्थन भारत ने क्यों किया?

भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया. इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि भारत लंबे समय से दुनिया के नक्शों में अफ्रीका और दक्षिणी गोलार्ध के देशों की सही लीडरशिप की मांग करता रहा है. पुराने नक्शे में ये देश छोटे दिखाए जाते थे, जो उनकी मौजूदा अहमियत को कम करता था. भारत ने 'समान क्षेत्रफल वाले मानचित्र प्रक्षेपण' (Equal-Area Map Projection) के सिद्धांत का समर्थन किया.

भारत ने साफ किया कि उसका समर्थन किसी खास नक्शे या सीमा बनाने के लिए नहीं है , बल्कि यह सिर्फ नक्शा बनाने के बेहतर तरीके के लिए है.

तो क्या भारत लाल रेखा खींचकर पीछे हटा?

यहां 'पीछे हटना' सही शब्द नहीं है. भारत ने समर्थन तो किया, लेकिन एक सख्त शर्त रखी. भारत को डर था कि कहीं नए नक्शे में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को गलत तरीके से या पाकिस्तान के दावे के मुताबिक न दिखा दिया जाए. इस वजह से वोट करने के दो दिन बाद यानी 6 सितंबर 2026 को भारत ने साफ कर दिया.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, 'भारत का संप्रभु क्षेत्र, जिसमें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं, भारत के आधिकारिक नक्शे के मुताबिक ही दिखाया जाना चाहिए. कोई भी गलत या भ्रामक जानकारी नहीं होगी. भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर उसका रुख मोलभाव करने वाला नहीं है.'

क्या UN का नया नक्शा भारत की सीमाओं को बदलेगा?

बिल्कुल नहीं! यह समझना सबसे जरूरी है. UN का यह प्रस्ताव सिर्फ नक्शा बनाने के तरीके को बदलने के लिए है. यह किसी भी देश की सीमाओं, विवादित क्षेत्रों या जगहों के नाम में कोई बदलाव नहीं करता. यानी गोल पृथ्वी को चपटे कागज पर कैसे उतारा जाए, इसकी तकनीक के बारे में काम होगा.

UN ने भी साफ कहा है कि यह प्रस्ताव किसी खास नक्शे या सीमा बनाने का समर्थन नहीं करता. यानी, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की स्थिति पर इसका कोई असर नहीं पड़ता. भारत ने बस अपनी सीमाओं के सही मैप दिखाने की मांग की, ताकि कोई गलतफहमी न हो.

UN के प्रस्ताव में कोई कानूनी बंधन नहीं है.
UN के प्रस्ताव में कोई कानूनी बंधन नहीं है.

आखिर दुनिया का मैप बदलने से क्या बदलेगा?

असल में बदलाव हमारी नजर में आएगा भूगोल में नहीं...

  • अब तक दुनिया में 'मर्केटर प्रोजेक्शन' नाम का नक्शा इस्तेमाल होता था, जिसे 1569 में नाविकों के लिए बनाया गया था. इसकी सबसे बड़ी खामी है कि भूमध्य रेखा (equator) के पास के इलाकों को छोटा और ध्रुवों के पास के इलाकों को बड़ा दिखाता है. यह गोल पृथ्वी को चपटे नक्शे में उतारने की चुनौती की वजह से हुआ.
  • पुराने नक्शे में दोनों एक जैसे दिखते हैं, जबकि असल में अफ्रीका ग्रीनलैंड से 14 गुना बड़ा है. अफ्रीका का क्षेत्रफल 3.03 करोड़ वर्ग किमी है, जबकि ग्रीनलैंड 21.6 लाख वर्ग किमी. UN ने अब 2018 में बने 'इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन' को अपनाने का फैसला किया है. इसमें महाद्वीपों का सापेक्ष क्षेत्रफल सही दिखता है, हालांकि दूरी नापने में यह पुराने जितना सटीक नहीं.
  • UN के प्रस्ताव में कोई कानूनी बंधन नहीं है. कोई भी देश या संस्था पुराना नक्शा बदलने के लिए मजबूर नहीं है. लेकिन मर्केटर नक्शा स्कूलों, टेक्नोलॉजी और सरकारी नक्शों में गहराई से बैठा हुआ है, इसलिए UN के इस समर्थन से धीरे-धीरे बदलाव आएगा.
  • फ्रांस ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि वह मर्केटर प्रोजेक्शन छोड़ेगा.